घाट की सीढ़ियों पर
घूँघट में लिपटी स्त्रियाँ,
जैसे जल में नहीं
अपने भीतर के समर्पण में उतरती हैं।
हर लहर में एक प्रार्थना
हर सांस में एक निश्चय
कांसे के सूप में जलते दीप,
कितने मौन हैं।
उनमें बोलती है व्रती स्त्री
जो सूर्य से भी पहले उठी थी
अंधकार से भी देर तक जागती रही
ठकुआ,पकवान, पूजन के बीच,
एक अर्चना आकार लेती है।
जैसे कठोर त्याग,
सूरज की गर्मी की तरह
भीतर से अमूर्त निर्मल काया।
इस व्रत की तपन
केवल देह की नहीं
यह आत्मा की दीर्घ यात्रा है
सूरज जब जल में उतरता है
स्त्रियाँ नहीं झुकतीं,
वे उठती हैं
उसी सूर्य के समान,
जो उनकी आँखों में हमेशा चमकता है।
– डॉ लक्की राज
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