आइने का सच | डॉ. पीतांबरी

सही कहा है किसी ने, हाथी के दांत दिखाने के ओर खाने के ओर। किसी से इतना भी प्रेम न करो कि वह आपको इसे आपकी कमजोरी समझने लगे। व्यक्तित्व के कई पहलू होते हैं,सुना था पर आज देख भी लिया। आईना सच ही कहता है, यह उसका भ्रम था, जो समय रहते टूट गया। क्यों सच्चे हृदय वालों के साथ ये ये सब होता है? क्यों उन्हें ही छला जाता है? यही सब कुछ सोचते सोचते कब प्रेरणा के आंखों से आंसू बह उठे, उसे पता ही नहीं चला।

“प्रेरणा…. प्रेरणा!… ।” प्रेरणा का पति रोहित कमरे में आया, तो उसने देखा कि प्रेरणा खिड़की के बाहर झांक रही है, उसे ध्यान ही नहीं रहा कि रोहित कब उसके बेहद करीब आकर खड़ा हो गया था। रोहित ने देखा कि प्रेरणा बाहर बगीचे में खेल रही एक बच्ची और उसकी मां पर था। मां बच्ची के पीछे पीछे उसे खाना खिलाने के लिए भाग रही थी और बच्ची थी कि मां के हाथ ही नहीं आना चाहती थी। यह देखकर रोहित ने धीरे से प्रेरणा के कंधे पर हाथ रखा तो प्रेरणा चौंक उठी।

“ अरे..आप..?”
“ हां… मैं। तुम अब भी अपनी मां को याद करती हो? तुम भूल क्यों नहीं जाती?”
“बहुत कोशिश की रोहित लेकिन…..।” कहते कहते प्रेरणा का गला भर आया। उसने मुंह फेर लिया और अपने आंसुओ को छिपाने की असफल कोशिश करने लगी।
“तुम इन आंसुओं को बहने दो प्रेरणा !.. वरना ये नासूर बन जाएंगे।” रोहित के स्वर में प्रेरणा के लिए चिंता थी।

“ क्या करूं मैं रोहित….. बचपन में ही मेरी मां मुझे छोड़कर चली गई। उसने पलटकर कभी नहीं देखा कि मैं जीवित भी हूं या नहीं। बचपन में मुझे मेरी मां की कमी बहुत खली। फिर….. फिर जब मैं उनसे मिली…….।” कहते कहते प्रेरणा कहीं खो सी गई।
“मशहूर मनोचिकित्सक डॉ. आशा से??”
“हां… जब मैं पहली बार उनसे मिली, तो उनके प्यार और ममतामय व्यवहार से मैं अभिभूत हो गई। धीरे धीरे उनसे मिलना जुलना होता रहा और मैं उनके करीब आ गई। मुझे लगा जैसे मेरी खोई हुई मां मुझे मिल गई हो। उनके चरणों में मुझे सुकून मिलता था, वे जब आशीर्वाद भरा हाथ मेरे सर पर रखतीं तो, मुझे आत्मिक शांति मिलती थी। मैं किसी छोटी बच्ची सी बन जाती थी, जब भी उन्हें मिलती…। लगता जैसे मेरा बचपन वापस आ गया हो……।” कहते कहते प्रेरणा का मुख खिल सा गया। होठों पर मुस्कान तैर गई।
“फिर…?”

“मैं प्रतिदिन उनसे मिलने जाया करती थी। आज जब मैं उनके क्लीनिक पहुंची तो देखा कि वे किसी से फोन पर बात कर रही हैं। मैं अंदर जाने की हिम्मत नहीं कर पाई और वही दरवाजे के बाहर बैठ गई और जो भी मैने सुना ……।” प्रेरणा ने आंखे बंद कर ली, जैसे वो कुछ सोचने लगी हो।
“ क्या सुना तुमने प्रेरणा….? अब बता भी दो।”

“ मैने सुना कि वे किसी से कह रहीं थी ‘अरे नहीं यार…. ऐसा कभी भी नहीं हो सकता। वो तो सिर्फ मेरी एक मरीज़ है, और कुछ भी नहीं। ऐसे कई मरीज मेरे पास प्रतिदिन आते हैं, तो क्या क्या मैं सभी से रिश्ता बना लूंगी? वो उसकी समस्या है कि वो मुझे क्या समझती है।’ सुनते ही लगा जैसे मुझे काटो तो खून नहीं। मैं स्तब्ध थी, लगा जैसे किसी ने मेरे पैरों तले से जमीन ही खींच ली हो और मैं औंधे मुंह गिर गई हूं। मुझे मेरे बेवकूफी और पागलपन पर अब क्रोध नहीं बल्कि हंसी आ रही थी।” कहते कहते प्रेरणा भावुक हो गई। रोहित ने उसे पकड़कर गले से लगा लिया और उसे चुप कराने लगा।
“मैने एक बार फिर से अपनी मां खो दी रोहित…।” प्रेरणा फुट फुटकर रोते हुए बोली।

“तुमने कुछ नहीं खोया प्रेरणा….. खोया तो उन्होंने हैं। तुम जैसी सच्चा प्यार करने वाली एक बेटी उन्होंने खो दी है। अब तुम्हारे पास दो विकल्प हैं, या तो तुम यूं ही रोती रहो या फिर स्वयं को इतना काबिल बनाओ कि तुम्हे किसी की नहीं बल्कि दूसरों को तुम्हारी जरूरत हो। तुम्हे मां का प्यार नहीं मिला, तो तुम उन बच्चों की मां बनो जिन्हें मां की जरूरत है।” रोहित प्रेरणा को हिम्मत देते हुए बोला।
“क्या ऐसा हो सकता है?”
“क्यों नहीं हो सकता…. आज भी हमारे समाज मैं ऐसे बच्चे है, जो अनाथालय में रहकर किसी मां और पिता का इंतजार कर रहे हैं। तुम यदि चाहो तो हम आज ही चलते हैं और एक बच्चे को गोद लेने की प्रक्रिया शुरू कर देते हैं।” रोहित ने मुस्कुराते हुए कहा।
“सच.. !!” प्रेरणा खुशी से उछल पड़ी। उसने खिड़की से बाहर देखा कि वह छोटी बच्ची अब अपनी मां की गोद में बैठी बड़े आराम से खाना खा रही है।

– डॉ. पीतांबरी

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