अभी हारा नहीं हूं।
मैं अभी हारा नहीं हूं,
इतना भी नकारा नहीं हूँ,
दीन-हीन बेचारा नहीं हूँ,
मैं धधकती हुई ज्वाला हूँ,
भोर का मुरझाया तारा नहीं हूँ।
सोच लो, समझ लो,
मैं अभी हारा नहीं हूँ।
तुम कहाँ पहचान पाए,
हम कई बार इस धरती पर आए,
कभी ईसा बनकर,
कभी सुकरात बनकर,
ज़हर पिया और मुस्कराए।
राख हो जाए जो जलकर ,
मैं वो बुझता अंगारा नहीं हूँ,
सोच लो, समझ लो,
मैं अभी हारा नहीं हूँ।
मैं हूँ महाराणा की हिम्मत,
शिवाजी की वो वसीयत,
भगत सिंह की हूँ परछाई,
बुद्ध की पावन नसीहत।
मैं गरजता सागर हूँ,
रेंगती कोई धारा नहीं हूँ,
सोच लो, समझ लो,
मैं अभी हारा नहीं हूँ।
फिर उठीं ग़म की घटाएँ,
फिर हुई बोझिल दिशाएँ,
आसमान सिर पर उठाए,
फिर चली पागल हवाएँ।
पर मैं जीवन की हकीकत हूँ,
कोई व्यर्थ का नारा नहीं हूँ,
सोच लो, समझ लो,
मैं अभी हारा नहीं हूँ।
– शिवदत्त डोंगरे (भूतपूर्व सैनिक)