1 –
जहाँ ख़ामोशी भी बोल उठे
आज़ादी एक ऐसी दुनिया की कल्पना की जंहा इंसानों को उनकी जात, धर्म, भाषा या पैसों से नहीं, बल्कि उनकी इंसानियत से पहचाना जाए। जहाँ किसी गरीब माँ बाप का उसके बच्चे को स्कूल भेजने का सपना पैसों की कमी से न बुझ जाए, और जरूरतमंद बीमार व्यक्ति का इलाज इसलिए न रोक दिया जाये कि अस्पताल की फीस नहीं दे सकता।
ऐसी जगह, जहाँ शिक्षा हर किसी के लिए बराबर हो, जहाँ अस्पताल सिर्फ इमारतें नहीं, बल्कि उम्मीदों का घर हो। जहाँ स्वास्थ्य सेवाएं पैसे के तराजू में न तौली जाए, बल्कि इंसान की ज़रूरत के हिसाब से उन्हें समय पर मिल जाए। सबसे बढ़कर, एक ऐसा समाज, जो बराबरी पर खड़ा हो न कोई ऊपर, न कोई नीचे। जहाँ सफलता का मतलब दूसरों को पीछे छोड़ना नहीं, बल्कि सबको साथ लेकर आगे बढ़ना हो।
इस दुनिया में शोर नहीं होगा न दिखावे का, न दौलत का, न ताकत का। यहाँ खुशियाँ चुपचाप भी महसूस की जा सकेंगी, और ख़ामोशी डर की नहीं, सुकून की पहचान होगी। यहाँ खामोशियाँ बहुत कुछ कहेगी बिना बोले, क्योंकि यहाँ हर इंसान जानता होगा कि वह सुना और समझा जा रहा है।
जहां हर किसी को सपने देखने और उन्हें पूरा करने का पूरा अवसर मिलेगा। जहाँ बच्चों की हँसी और बड़ों की चुप्पी दोनों का अपना एक महत्व होगा। जहाँ प्रकृति, इंसान और खुशियाँ एक ही लय में साँस लें।
ऐसी जगह… जहाँ ख़ामोशी भी बोल उठे।
2-
जहाँ ख़ामोशी भी बोल उठे !
सिर्फ जरूरत ही जरूरी हो, ऐसा तो नहीं,
खुली हवा में सांस लेना भर, आजादी तो नहीं।।
जहाँ ख्वाहिशें बांधनी ना पड़े घर के किसी कोने में,
जहाँ न बीते रात किसी की, चुपचाप रोके तकिया भिगोने में।
जहाँ तमाम उम्र ना बीते बस जिम्मेदारियां निभाने में,
जहाँ थोड़ा वक्त भी बीते खुद से मिलने-मिलाने में।
जब सोच पर कोई पहरे ना हों, दिल में दबे जज्बात गहरे ना हों।
जब अधिकार बराबर हो सबके धरातल पर, आते-आते दोहरे ना हों।
जब आजादी किसी से मांगनी ना हो खुद की पहचान भी खुद का अधिकार हो,
जहाँ मौन डर से नहीं शान्ति से उठे। जहाँ ख़ामोशी भी बोल उठे ।
– मोनिका शर्मा