रिश्तों के लिए सबसे प्यारी कविता – कल्पना अवस्थी

रिश्ते मर रहे हैं

जीवन मूल्य कतरा- कतरा बिखर रहे हैं,

इंसान जी रहे हैं और रिश्ते मर रहे हैं।

प्रयोगशाला के प्रयोग -सा हो गया है जीवन,

लोग नित नव प्रयोग कर रहे हैं।

 

सहजता, अपनत्व मिट रहा देखो,

लोग ऐसी नव्य सोच का शोध कर रहे हैं।

जाने क्यों सब बनावटी होता जा रहा,

बस स्वार्थ की आग जल रही है।

 

ऊपरी हमदर्दी दिखाते लोग,

भीतर कटु भावना पल रही है।

किन दायरों में सिमटते जा रहे रिश्ते अब,

हैसियत से इंसान का सम्मान होता है।

 

नयापन इतना है कि,

अमीरी- गरीबी के तराजू में इंसान का मान होता है।

क्या कहूँ और क्या छोड़ दूँ;

इन अटकलों पर भाव मेरे बिखर रहे हैं,

इंसान जी रहे और रिश्ते मर रहे हैं।

 

कोई चोटिल पड़ा है सड़क पर,

तो उसके वीडियो बनाये जा रहे हैं।

हाल – चाल का दौर बीत गया साहब,

अब फोन से संबंध निभाए जा रहे हैं।

 

दिल में दिमाग रखकर रिश्ते चल रहे हैं,

क्या ही कहूँ, आस्तीन मे बस सांप पल रहे हैं।

इतनी बदलती कहानी की रवानी क्या लिखूँ?

जो उलझन में बीत रही, वो जवानी क्या लिखूँ?

साथ बैठ सब खाना खा लें ये परंपरा पुरानी हो रही,

लगाव में भी अलगाव हो रहे हैं।

 

एक अजीब सी हैरानी हो रही,

हनन हो रहा है अपनेपन का इस कदर कल्पना,

कि अब जज़्बात भला कहाँ संवर रहे हैं!

इंसान जी रहे और रिश्ते मर रहे हैं।

– कल्पना अवस्थी ‘दर्पण’

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