ग़म उठाए बहुत इक खुशी के लिए।
रोज़ मरते रहे ज़िंदगी के लिए।।
आदमी हो के बस आदमी सा लगे।
है ये मुश्किल बहुत आदमी के लिए।।
चल सको तो ज़माने के संग ही चलो।
कोई रुकता नहीं है किसी के लिए।।
इश्क़ में अक़्लमंदी है लाजिम नहीं।
थोड़ा पागल बनो आशिक़ी के लिए।।
एक दीया चला रात भर रात संग ।
कोई सूरज न था रौशनी के लिए।।
सर झुकाना महज़ है इबादत नहीं।
दिल झुकाओ ज़रा बंदगी के लिए।।
मर गया वो निभाते हुए दुश्मनी।
हम हैं ज़िंदा अभी दोस्ती के लिए।।
कभी जाकर हिमालय से पूछो ज़रा।
कैसे गलता है वो इक नदी के लिए।।
‘राज’ परदेस में सब मिला तो मगर।
इक कसक दिल में है सरज़मी के लिए।।
– राजेन्द्र वर्मा ‘राज’
रायबरेली (यू पी)