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दिल के कमरे को गुलाबों से सजा रखा है | कलीम रज़ा
गर ज़िंदगी में यूँ दुश्वारी नहीं आती | राजेन्द्र वर्मा ‘राज’
खुद से करने हैं कुछ काम मुझे ग़ज़ल ~ तारा इक़बाल
सर पे है मेरे बाप का साया अभी तलक, ग़ज़ल – प्रदीप प्यारे
सारे दौलत पर ध्यान देते हैं हिंदी ग़ज़ल – अभिषेक सिंह ‘ अंकुर ‘
न सोचा था ये दिल लगाने से पहले ग़ज़ल – शकील बदायूंनी
इक मकाँ और बुलंदी पे बनाने न दिया , ग़ज़ल – मंज़र भोपाली
ग़ज़लें – राहत इंदौरी
लगा कर दिल, सजा वो पा रहा है, ग़ज़ल – अकबर खान ‘ अकबर ‘
ये ज़बाँ हम से सी नहीं जाती, ग़ज़ल – दुष्यंत कुमार
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