एक घर में एक बिल्ली रहा करती थी, बड़ी सुंदर…! सुंदर और चमकीली आँखें और ऊपर से श्वेतवर्णीय। लेकिन वह उस घर में स्वयं को अकेला महसूस करती थी। दिनभर अकेली और उदास बैठी रहती। उसी घर में एक चूहा भी रहा करता था, जो प्रतिदिन बिल्ली को देखा करता। बिल्ली की सुंदरता और उसकी शांत किंतु गहरी आंखों ने उसे मोह लिया था। उसे लगता था मानों इस पृथ्वी पर इससे सुंदर कुछ हो ही नहीं सकता था। डर के मारे वह बिल्ली के सामने जाने की हिमाकत भी नहीं कर सकता था। उसे पता था कि यदि वह बिल्ली के सामने गया तो बिल्ली उसे नहीं छोड़ेगी और उसकी इह लीला यहीं समाप्त हो जाएगी।
एक दिन जब बिल्ली आराम कर रही थी, तब चूहा उसे बड़े गौर से देख रहा था, तभी अचानक उसे पता नहीं क्या हुआ,वह बिना अपने प्राणों की परवाह किए बिल्ली के बेहद करीब आ खड़ा हुआ और बोल पड़ा “वाह..!…वाह..! ईश्वर ने आपको क्या खूब बनाया है। आपसे सुंदर इस धरा पर शायद ही कोई हो।”
बिल्ली ने आँखें खोलकर देखा तो सामने एक अदना सा चूहा था, जो मंत्रमुग्ध होकर उसे ही देखे जा रहा था। बिल्ली को उसके बोल बड़े ही कर्णप्रिय लगे। उसने बड़ी ही मीठी वाणी में पूछा “कौन हो भाई तुम, जो मेरी इतनी तारीफ किए जा रहे हो? मुझे कैसे जानते हो??”
“आपका भक्त हूं, महोदया। प्रतिदिन आपको निहारता रहता हूं। आप कितनी शांतचित्त हैं। आप मेरे लिए पूज्यनीय हैं।” चूहे ने नतमस्तक होते हुए कहा।
बिल्ली के होठों पर मुस्कान तैर गई। हमेशा उदास रहने वाली बिल्ली का हृदय आज उछाले मार रहा था। अब यह प्रतिदिवस का हो गया था, जब भी बिल्ली उदास हो जाती चूहे के मुख से अपने लिए तारीफ सुनकर उसका दिन बन जाता। चूहे की भक्ति और प्रेम बिल्ली के लिए उसके खुश रहने का जरिया बन चुकी थी। लेकिन चूहे की भावनाएं बिल्ली के लिए कोई मायने ही नहीं रखती थी, उसे बस अपनी तारीफ ही सुननी होती थी, ताकि उसका दिन बन जाए। बिल्ली को लगता था कि वह है ही इतनी सुंदर कि चूहा उसकी भक्ति करने पर मजबूर हो गया है। बिल्ली को अपने रूप पर गर्व हो चुका था। उसे लगता था कि चूहा उसे छोड़कर अब कहीं नहीं जाएगा।
एक दिन चूहा बीमार पड़ गया और वह दिन भर अपने बिल से बाहर ही नहीं आया। बिल्ली बड़ी बैचेन हो चली थी कि आज चूहा न तो आया और न ही उसकी तारीफ की। बिल्ली को अब क्रोध आने लगा था, वह बड़बड़ाते हुए टहलने लगी “ उस चूहे की इतनी हिम्मत…. लगता है उसे उसकी औकात याद दिलानी पड़ेगी।”
वह चूहे के बिल के पास खड़े होकर चिल्ला चिल्लाकर चूहे को बाहर आने को कहने लगी।
चूहे ने जब बिल्ली की क्रोध भरी आवाज सुनी तो घबराकर उठ बैठा। “आज इन्हें क्या हो गया?” कहते हुए चूहा बिल के बाहर आ खड़ा हुआ।
“जी…. महोदया!….. कहिए क्या बात है?… आपको कोई कष्ट????” चूहा बड़ी ही कमजोर वाणी में बोला।
“कष्ट तो तेरे ही कारण है, तू आज क्यों नहीं आया? तेरी इतनी हिम्मत कि तू मेरी बात टाले?” बिल्ली आवेश में बोले जा रही थी। क्रोध में उसे चूहे का कमजोर शरीर और उसकी बेचारगी भी दिखाई नहीं दे रही थी।
“महोदया……..मेरी बात तो सुनिए….” वह अपनी बीमारी की बात बिल्ली को बता देना चाहता था। किन्तु बिल्ली कुछ भी सुनने को तैयार ही नहीं थी।
“क्या सुनूं……मुझे कुछ नहीं सुनना, या तो तुम प्रतिदिन मेरी सेवा में प्रस्तुत रहोगे या फिर तुम्हें इस घर को छोड़कर जाना होगा…।”बिल्ली आवेश के साथ बोल पड़ी।
चूहा नतमस्तक था, किन्तु उसकी आँखें नम थीं। वह चुपचाप अपने बिल में गया और सोचने लगा कि क्या उसकी श्रद्धा बिल्ली के हृदय को छू भी नहीं सकी? बिल्ली के जीवन में उसका क्या स्थान है? उसके द्वारा दिए गए निश्छल प्रेम के बदले क्या उसे भी प्रेम नहीं मिलना चाहिए था? चूहा समझ चुका था कि इस रिश्ते का अब कोई भविष्य नहीं है, इस हेतु उसका यहां से हमेशा हमेशा के लिए चला जाना ही उचित होगा।
भारी मन के साथ चूहे ने एक दृष्टि बिल से बाहर निकल मुंह फुलाकर बिल्ली पर डाली जो इस आशा में बैठी थी कि चूहे को अपनी गलती का एहसास होगा और वह उससे अपने किए की माफी मांगेगा।
“ मैने आप पर हमेशा असीम श्रद्धा रखी। आप के लिए वह सब कुछ किया ,जो आपने चाहा,लेकिन लगता है मैं आपका हृदय जीत नहीं पाया। मुझे क्षमा कीजिए,मैं अब भारी मन के साथ यहां से जा रहा हूं। मेरी वजह से आपको जो भी कष्ट हुए,उसके लिए मै क्षमा प्रार्थी हूं,लेकिन आज मेरी तबियत ठीक नहीं थी इसलिए आपकी सेवा में उपस्थित नहीं हो पाया। लेकिन यह भी सच है कि मेरे हृदय में जो आपके प्रति स्नेह भावना है, वह सदा सर्वदा बनी रहेगी……। आप अपना ख्याल रखिएगा।” इतना कहने के साथ ही चूहा घर से बाहर चला गया।
बिल्ली फटी फटी आंखों से चूहे को जाते हुए देखती रही। आज चूहे ने उसके अहंकार के टुकड़े टुकड़े कर डाले थे। आज उसकी आंखों में भी अश्रु थे, जो अविरल बहे जा रहे थे। सही मायने में आज चूहा बिल्ली के हृदय में भाव जगा चुका था।
– डॉ. पीतांबरी
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