गर ज़िंदगी में यूँ दुश्वारी नहीं आती।
शायद हमें इतनी समझदारी नहीं आती।।
कांँटों के साथ रहना भी सीख लीजिए।
हर एक के हिस्से में फुलवारी नहीं आती।।
चारों तरफ लगी हैं झूठों की क़तारें।
सच बोलने वालों की बारी नहीं आती।।
दिल का तमाम हाल दुनिया से कह दिया।
इन आँसुओं को भी वफ़ादारी नहीं आती।।
जब मौत आयी तूने भी कर लिया किनारा।
ऐ !ज़िंदगी तुझे भी यारी नहीं आती।।
दुनिया नहीं समझती सच्ची सरल बातें।
हम हैं कि हमको अदाकारी नहीं आती।।
आख़िर में बस मिलेगी दो गज़ ज़मीन ही।
उस वक्त काम कोई ज़मीदारी नहीं आती।।
कुछ दिन से ‘राज’ हिचकियाँ आयीं नहीं तुम्हें।
शायद किसी को याद तुम्हारी नहीं आती।।
राजेन्द्र वर्मा ‘राज’
रायबरेली (यू पी)