आज पंजाब और हरियाणा की धरती आँसुओं से भीग रही है। वहाँ के लोग अपनी पीड़ा में तड़प रहे हैं, और हम में से कितने लोग हैं जो इस दर्द को अनदेखा कर अपनी आँखें बंद किए बैठे हैं। यह केवल पंजाब और हरियाणा का संकट नहीं है, यह पूरे भारत की आत्मा पर लगा हुआ घाव है। और जो समाज इस घाव को अनदेखा करता है, उसकी इंसानियत धीरे-धीरे मर ही जाती है।
अगर बात करें पंजाब की तो पंजाब ने कभी हमें भूखा नहीं सोने दिया। यही धरती हमारे लिए अन्न उगाती है, यही धरती वीर जवानों को जन्म देती है, जो देश की रक्षा के लिए अपना लहू बहा देते हैं। और आज जब वही पंजाब त्रासदी से गुजर रहा है, तो हम खामोश क्यों हैं? क्या हमारी चुप्पी उनके दर्द को और गहरा नहीं कर रही?
आप भी याद रखिए कि खूबसूरती, पैसा, दौलत, शोहरत, रुतबा, ये सब नश्वर हैं। ये सब एक दिन मिट्टी में मिल जाने वाले हैं। न तो धन साथ जाएगा, न रूप, न ही नाम की चमक। जो बचेगा, वह केवल हमारी इंसानियत होगी। अगर इंसान होकर हम इंसानियत का परिचय ही न दे पाएँ, तो फिर यह जीवन किस काम का?
आज पंजाब के आँसू हमें पुकार रहे हैं। जानवर मर रहे हैं, बच्चे रो रहे हैं, बूढ़े – बुजुर्ग तड़प रहे हैं। ये भूख की तड़प है या जीने की चाह, अच्छाइयों का सबक है या अपनेपन की छटपटाहट, भगवान् जाने। लेकिन यह वक्त चुप रहने का नहीं है, यह वक्त इंसानियत का हाथ बढ़ाने का है। जो लोग समाज में इस दर्द को नकार रहे हैं, जो आँखें मूँद कर बैठे हैं, वे याद रखें कि एक दिन उनके दरवाज़े पर भी त्रासदी दस्तक दे सकती है। और तब शायद समाज भी उनकी तरह खामोश रहेगा।
हमारा कर्तव्य है कि हम पंजाब के साथ खड़े हों। उनके दुःख को, उनकी तकलीफों को, उनकी परेशानियों को अपना दुःख , अपनी तकलीफ़, अपनी परेशानी मानें। यह केवल सहानुभूति की बात नहीं है, यह हमारी आत्मा को बचाने की लड़ाई है। क्योंकि अगर इंसानियत मर गई, तो फिर कोई दौलत, कोई शोहरत, कोई खूबसूरती कभी भी हमारे काम नहीं आएगी।
आओ, हम सब मिलकर अपने दिलों की खिड़कियाँ खोलें। इस दर्द को महसूस करें, अपनी आवाज़ को पंजाब और हरियाणा की आवाज़ से मिलाएँ। हमें यह साबित करना होगा कि समाज अभी भी ज़िंदा है, इंसानियत अभी भी ज़िंदा है। आज हरियाणा और पंजाब के आँसू हमसे सवाल कर रहे हैं जब हमने देश का पेट भरा, जब हमने अपने बेटे सीमा पर बलिदान दिए, तब हम आपके थे। और आज जब हम पीड़ा में हैं, तो क्या आप हमारे साथ खड़े हैं?
” इंसान वही है, जो दूसरों के आँसू पोंछे,
वरना दौलत और शोहरत तो कफ़न में भी सजाई जाती है।”
मैं एक बार अमृतसर ( पंजाब ) गया था। पंजाब की धरती पर कदम रखते ही दिल में एक अनोखा सुकून मिला। लहलहाते खेत, मिट्टी की खुशबू और गुरुद्वारों की शांति ने आत्मा को छू लिया। सबसे बड़ी खूबसूरती यहाँ के लोगों में है, उनका अपनापन, उनकी मेहमाननवाज़ी और दिल से निकली मुस्कान। इस यात्रा ने सिखाया कि असली दौलत धन-दौलत में नहीं, बल्कि इंसानियत और सादगी में है। आज उसी अपनेपन, उसी मेहमाननवाज़ी, उसी इंसानियत को याद करके मैं इस लेख को लिख रहा हूं। मेरी भगवान् से यही प्रार्थना है कि जितनी जल्दी हो सके सबकुछ सही हो जाए। सबकुछ यानी सबकुछ।
अभय प्रताप सिंह
लेखक एवं संस्थापक, लेखनशाला
रायबरेली ( उत्तरप्रदेश )