हे, गगन के सजग प्रहरी – अमर सिंह वर्मा

:: हे, गगन के सजग प्रहरी ::

गिरि* के शिखर को चूमते, यूँ झूमकर तुम गा रहे ।
कर आलिंगन सूर्य का, नभ पर, निडर हो, छा रहे ।।०।।

घनघोर अट्टहास* कर, तुमने डराया सिंह को ।
स्वच्छंद विचरण कर, पराजय, दी सदा विहंग* को ।।
श्याम, कजरारे, घने, रवि-रश्मियों* को भा रहे ।
कर आलिंगन सूर्य का, नभ पर, निडर हो, छा रहे ।।१।।

गंध बिखरे पुष्प से, मद्धिम हवा जब चूमती ।
सँग मिलते ही तुम्हारा, हो प्रफुल्लित झूमती ।।
मोतियों से, धरा* का, श्रृंगार करते जा रहे ।
कर आलिंगन सूर्य का, नभ पर, निडर हो, छा रहे ।।२।।

चँद्र से अठखेलियाँ, रवि से मिला करते गले ।
हो सुसज्जित सैन्य सँग, ज्यों कोई नृप*, नभ पर चले ।।
दुंदुभि, भेरी, नगाड़े, ले समर* को जा रहे ।
कर आलिंगन सूर्य का, नभ पर, निडर हो, छा रहे ।।३।।

तृप्त करने धरा, अमृतरस के घट, भर लाये हो ।
स्वच्छ जल, अविरल लिए तुम, आज नभ पर छाए हो ।।
कामना फल की नहीं, बस कर्म करते जा रहे ।
कर आलिंगन सूर्य का, नभ पर, निडर हो, छा रहे ।।4।।

रक्तवसना ऊष:काले, मध्यकाले शुभ्रवसन, ।
मलिनवसना सांध्यकाले, भिन्न तुम, आठों पहर ।।
हे गगन के, सजग प्रहरी*, तुमको शीश नवा रहे ।।
कर आलिंगन सूर्य का, नभ पर, निडर हो, छा रहे ।।५।।
–::–
*गिरि=पर्वत, *अट्टहास=गर्जन,
*विहंग = पक्षी, *धरा = पृथ्वी,
*रवि-रश्मियाँ = सूर्य-किरणें,
*नृप = राजा, *समर = युद्ध,
*प्रहरी = सिपाही ।

                     – अमर सिंह वर्मा, जबलपुर 

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