कब तक प्रीत लुटाऊँ सब पर
कब तक प्रीत लुटाऊँ।
अपने रूठे, अपने टूटे कब तक यार मनाऊं,
कब तक कदमों में सिर रखकर सबकी ठोकर खाऊं,
ऐसे कब तक खुद को हारूं,सबको जीत दिलाऊं,
इससे तो अच्छा है ये, गैरों को मीत बनाऊं।
कब तक प्रीत लुटाऊँ सब पर,
सब दुनिया मतलब की है मैं किसे यहाँ अपनाऊं,
कब तक अपनी आस्तीन में, मै विषधर पलवाऊं,
कब तक उनको दूध पिलाऊं खुद को ही डसवाऊँ,
इससे तो अच्छा है कि अहिरिपु को मीत बनाऊं,
कब तक प्रीत लुटाऊँ सब पर,
नफ़रत के सहरा में कैसे उल्फ़त यार खिलाऊं,
इस पत्थर के शहर में कैसे शीशमहल बनवाऊं,
ऐसे कब तक लड़ूं भाग्य से कैसे उसे हराऊं,
इससे तो अच्छा है ये कि नियति को मीत बनाऊं ।
कब तक प्रीत लुटाऊँ सब पर,
कब तक प्रीत लुटाऊँ सब पर,
– मयंक तिवारी
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