मां पर कहानी , मां तो मां होती है।

मां तो मां होती है 

पाटलिपुत्र से बेतिया तक के सफर में इंटरसिटी एक्सप्रेस में एक महिला ने अपने बीस साल के बेटे के साथ मेरे बगल में आकर थोड़ी जगह देने के लिए आग्रह किया।मैं सहर्ष तैयार हो गया।पर भीड़ की वजह से उनका बेटा खड़ा रहा,जिसे वापस लौटना था। चूंकि ट्रेन खुलने में अभी काफी समय था,इसलिए मैंने बच्चे को भी बगल की सीट पर बैठा दिया।
मां – बेटा दोनों आपस में बात करने लगे। मां बच्चे को समझा रही थी कि अच्छे से रहना और पढ़ाई करना तथा समय पर नाश्ता-खाना ज़रूर लेते रहना।उनकी बातचीत से लगा कि बच्चा अपनी माॅं के किसी फैसले से नाराज़ है।वह बार-बार कह रहा था कि कल से दो घंटे देर से उठूॅंगा और दो दिन कॉलेज नहीं जाऊॅगा।दो दिन बाद छुट्टी होते सीधे बस पकड़कर तुम्हारे पास आ जाऊॅंगा।मैं नाश्ता-खाना भी नहीं खाऊॅंगा ठीक से।मैं तुम्हारी कोई बात नहीं मानूॅंगा।मुझे अपने से दूर करना चाहती हो न? मैं तुम्हें छोड़कर कहीं नहीं रह पाऊॅंगा।मेरा मन वहाॅं नहीं लग रहा है।
महिला बेटे को अपने तरीके से समझा तो रही थी,पर उन्हें यह डर भी सता रहा था कि ट्रेन खुलने के बाद बच्चा कहीं अपनी मनमानी न करे!वह उससे कह रही थी कि तुम अपना बचपना छोड़ो।तुमने अपनी योग्यता के बल पर अपना लक्ष्य हासिल किया है,इसलिए तुम्हें इससे भागना नहीं,अपितु जूझना है और अच्छा करना है।बच्चे ने अपनी बात रखी कि मुझसे तुम्हारी जो अपेक्षा थी,उसे तो मैंने पूरा किया।पर,मेरी अपेक्षा का क्या ?मेरी तो बस इतनी ही अपेक्षा है कि मैं हमेशा तुम्हारे पास रहूं।मेरा नाम यहां से कटवा कर घर के पास ही किसी कॉलेज में लिखवा दो।प्लीज़..!

अपनी बात रखते हुए उसकी आंखों से आंसू छलक पड़े।महिला ने अपने बेटे के आंसुओं को पोछते हुए कहा-“एकदम बुद्धू हो तुम!मैं तुम्हें छोड़कर कहीं नहीं जा रही।मैं हर रविवार और छुट्टी के दिन तुमसे मिलने तुम्हारे हॉस्टल ज़रूर आऊंगी और रोज़ तुमसे दिन में दो बार वीडियो कॉल पर बात करुंगी।”
इस बीच ट्रेन खुलने का समय होने पर मैंने महिला से कहा-“ट्रेन अब खुलेगी।बेटा को बोल दीजिए कि उतर जाए।”उसने अपने बेटे को उतरने के लिए कहा तो फिर उसकी आँखें छलक पड़ी और बेमन से वह ट्रेन से उतर कर प्लेटफॉर्म की कुर्सी पर बैठ गया।

मां – बेटे के बीच के अटूट भावनात्मक लगाव को मैं अपलक निहारे जा रहा था।इधर मां की निगाहें प्लेटफॉर्म पर मुंह लटका कर बैठे उदास बेटे की ओर लगी हुई थी;तो उधर बेटे का अपनी मां के प्रति निश्छल मोह और समर्पण का भाव अद्वितीय,अनुपम रूप में मेरी आंखों के सामने था।
ट्रेन नियत समय पर खुली। मां ने बेटे को हाथ हिलाकर बाय किया,पर उसने सर झुकाए हुए कोई जवाब नहीं दिया।अब मां की आँखें छलक पड़ीं।

आंसुओं को जब वे अपने दुपट्टे से पोछ रही थी तो मैंने पूछा कि बेटा का एडमिशन किसी कोचिंग में कराईं हैं??अपने को नियंत्रित करते हुए महिला ने कहा-“जी,अभी एक सप्ताह पहले एक प्रतिष्ठित सरकारी कॉलेज में नीट परीक्षा में सफल होने पर एमबीबीएस कोर्स के लिए उसका दाखिला कराया है।कॉलेज,हॉस्टल सभी बढ़िया मिला है,पर भावनात्मक रूप से मुझसे इतना जुड़ा हुआ है कि वह हमेशा मेरे पास ही रहना चाहता है।वह चाहता है कि एमबीबीएस कोर्स से उसका नाम कटवाकर बी.एससी.में लिखवा दूं।अब बताइए आप कि मैं उसकी बात कैसे मान लूं ??मुझे उसके भविष्य के लिए उसे अपने से दूर करना ही पड़ेगा।उसने अपनी मेहनत के बल पर नीट परीक्षा में सफल होकर वैसा कॉलेज हासिल किया है।बहुत ही भावुक है।कहता है कि मुझे कॉलेज में बहुत अच्छा लगता है,पर हॉस्टल में नहीं रहना चाहता हूं। इसके पापा यहाॅं रहते तो मुझे कोई दिक्कत ही नहीं थी।मुझे दोनों की भूमिका निभानी पड़ती है।अधिक कड़ा व्यवहार भी नहीं कर सकती और उसकी इच्छा को पूरी भी नहीं कर सकती।बहुत ही प्यारा बच्चा है।मैं चाहती हूॅं कि वह जल्द ही अपने कॉलेज के वातावरण में घुल-मिल जाय और मुझे भूल जाये।उसके भविष्य के लिए न मैं कमज़ोर बनना चाहती और न उसे बनने देना चाहती।

आज जबकि हम कुछ हासिल करने के बाद अपनी जन्मदात्री को ही महत्त्व देना पसंद नहीं करते;ऐसे में उस महिला को मेरा प्रणाम तथा उस होनहार बच्चे से अपेक्षा रखता हूॅं कि वह अपनी मासुमियत को सदा जीवंत रखे और माॅं के प्रति अपने लगाव में ज़रा भी कमी कभी न आने दे!

-डॉ. कुमार अनुभव
पटना,बिहार

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