पंचानन की कथा | कला कौशल | कहानी

कहानी

                   पंचानन की कथा

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                     कला कौशल

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कहानी की कहानी

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मैंने एक सपना देखा। रेलवे स्टेशन की पश्चिमी गुमटी स्थित पान की दुकान पर मैं और राकेश प्रवीर जी खड़े हैं। दोनों की साइकिल पास में लगी है। तभी पल भर के लिए हम दोनों जुदा होते हैं। मैं स्टेशन और गुमटी के बीच रेलवे केबिन के सहायक स्टेशन मास्टर और अपने मित्र प्रदीप की टोह लेने बढ़ जाता हूॅं। वहाॅं से लौटते वक्त प्रदीप मेरे साथ होता है। पर यहाॅं प्रवीर जी की साइकिल नदारद मिलती है। मेरे पूछने पर तमोली ने अनभिज्ञता ज़ाहिर की। शायद वे स्वयं आकर ले गए हों।

मैं और मित्र प्रदीप स्टेशन के पूर्वी छोर पर ‘आर्यावर्त’ अख़बार के कार्यालय में चले जाते हैं। वहाॅं संपादक के साथ अख़बार कर्मियों की मीटिंग चल रही है। प्रवीर जी हम दोनों को एक किनारे में बैठा कर आधे घंटे की मोहलत लेते हैं। इस बीच मैं; प्रदीप को अकेला छोड़कर वेद प्रकाश शुक्ल जी के यहाॅं चला जाता हूॅं। अंधेरा उतर आया था,अतः वेद प्रकाश जी अपने यहाॅं ही ठहर जाने का आग्रह करते हैं। पर मैंने अपने मित्र का हवाला देकर वहाॅं से विदा ले ली। रास्ते में प्रदीप मिल जाता है। उसने बताया कि प्रवीर जी अपने डेरे का पता देकर कहीं गए हैं। हम लोगों को वहीं चलना है।

उसके अनुसार हम चतुर्दिक खड़े एक विशाल आवासीय परिसर में पहुॅंचते हैं। प्रदीप ने बताया कि छठी मंज़िल पर प्रवीर जी का आवास है। हम लोग उक्त स्थल पर पहुॅंचते हैं। वहाॅं एक दरवाज़े पर दस्तक देने से जो व्यक्ति बाहर निकलता है, वह प्रवीर जी को नहीं जानता। इस पर मेरी उससे बातचीत थोड़ी तल्ख़ हो जाती है। उधर ऊपर से उतरते हुए एक अन्य व्यक्ति से प्रदीप; प्रवीर जी के बारे में पूछ लेता है। इधर पहले वाला व्यक्ति बरामदे की रेलिंग से नीचे गिर पड़ता है। रेलिंग से सटे बिजली के कई तार उसके भार से आपस में उलझ जाते हैं। एक ज़ोरदार स्पार्किंग होती है। जिससे घबराए लोग अपने-अपने घरों से बाहर निकल आते हैं। तभी प्रवीर जी भी दनदनाते हुए ऊपर आ जाते हैं।

सभी घरदारों ने मुझ पर हमले बोल दिये। हमले-जुमले से उद्विग्न मन मैं; प्रदीप और प्रवीर जी अख़बार कार्यालय की ओर चल देते हैं। मेरे पीछे कुछ शोहदे लग जाते हैं। बाद में जाॅंच ब्यूरो भी इसकी तहक़ीकात शुरू कर देती है।

मैं अपने को निर्दोष बताता हूॅं। प्रवीर जी से भी अपनी मदद की दरख़ास्त करता हूॅं। इस पर उनका कहना था कि इस पूरे प्रकरण पर मैं एक कहानी लिखूॅं। जिसमें मैं अपना गुनाह कबूल कर रहा होऊॅं। वे उस कहानी को छापेंगे।

मैंने कहा-“आप लिख कर दें कि आपके कहने पर मैंने अपना गुनाह कबूल किया है।”

वे कहते हैं-“क्या आपको अपने मित्र पर भरोसा नहीं ?”

मुझे आप पर पूरा भरोसा है पर लेखन की जगह वाचन का क्या वजूद ! मैंने स्पष्ट किया।

अंततः हम दोनों के बीच यह समझौता होता है कि वह भी एक कहानी लिखेंगे,जिसमें मुझे वे बेगुनाह साबित करेंगे। उसी समझौते के तहत यह कहानी लिखी गयी है।

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पद्म विभूषण देश गौरव अब नहीं रहे। पर जिस दिन सरकार ने उन्हें देश के इस नागरिक सम्मान के लिए चुना,प्रतिवर्ष वे इसे ‘उपलब्धि-दिवस’ के रूप में मनाते थे। उनके गुज़र जाने के बाद गाॅंव के लोगों ने भी इसे ज़ारी रखा। पंचानन उसी गाॅंव का एक युवक था। उपलब्धि-दिवस के सफ़ल संयोजन के लिए ग्रामीणों ने कई तरह की समितियां बना रखी थीं। पंचानन उन्हीं समितियों में स्वयं-सेवकों का प्रधान था।

तैंतीस कोटि देवता क्या अपने-अपने समय के देश गौरव थे। उनके सुकृतियों के गीत गाते-गाते शायद लोगों ने उन्हें मनुष्येतर बना दिया। आख़िर क्यों नहीं, अपने देश गौरव भी देवता हो जाएं! देवताओं को भी तो उनके पुण्य-प्रताप के कारण ही हम पूजते हैं। स्वयं-सेवक की लाठी थामे पंचानन अक्सर इसी चिंता में डूब जाता और मंच पर ज़ारी वाचन-क्रम उसकी समझ से छूट जाता था।

क्या अगला देश गौरव मैं नहीं हो सकता? क्यों नहीं हो सकता जी! अब तो देश गौरव होना आसान भी है। क्यों नहीं ऐसा किया जाए कि कुछ वर्षों में अपने देश गौरव को धीरे-धीरे प्रेरणा-पुंज से ठेल-ठेल कर तैंतीस कोटि देवताओं के खाने में पहुॅंचा दिया जाये। ज्यों ही प्रेरणा-पुंज खाली होगा, सरकार के सामने पद्म विभूषण देश गौरव नागरिक सम्मान के लिए दावा ठोक दूॅंगा।

पंचानन अपने दिवा स्वप्न से जब लौटता तब तक उपलब्धि-दिवस सत्समागम का समापन देश गौरव अमर रहें के शंखनाद से हो रहा होता। अगले समागम में अभी पूरा एक साल बाक़ी था। पर देश गौरव के संबंध में कुछ ऐसा अनूठा करने के विचार से वह अपने घर लौटा था, जिसे आज तक किसी ने ना किया हो। वह इसी उधेड़बुन में लगा रहता। वह अपनी इस योजना में किसी को शामिल भी नहीं करना चाहता कि कहीं कोई उसे हड़प न ले। फिर तो वह देश गौरव बनने की दिशा में बढ़ने से चूक जाएगा।

सोचते-सोचते उसके मन में एक विचार आया था। क्यों नहीं,देश गौरव के निहायत निजी जीवन के बारे में कुछ प्रदर्शित किया जाये। जैसे देश गौरव कैसे पैरों से लिखते थे ! बाएं हाथ से खाते थे और खड़े-खड़े सोते थे ! घर पर वे सूट-बूट पहनते और टाई लगाते पर बाहर धोती-कुर्ता पहनते थे। आदि-आदि। अगले उपलब्धि-दिवस पर सर्वथा इस नए और अछूते विषय पर एक झाॅंकी निकाली जाये। यह सद्विचार उसके मन में जम गया था।

सचमुच अगले साल उसने समागम स्थल पर कोरे कैनवास पर अपनी झाॅंकी प्रस्तुत की। मुख्य अतिथि ने उसे फैला कर उसका उद्घाटन किया। वाचकों ने भी आतिथेय का बख़ूबी ऋण चुकाया,खूब प्रशंसा की। बल्कि यह कहना ज़्यादा मुनासिब होगा कि तमाम वाचकों ने झाॅंकी से ही शुरू और समाप्त किया। इस तरह एक बार फिर वह खो गया। एक ऐसे स्वप्निल पल की तलाश में जब सब कुछ उसके सोचे और रचे के अनुसार होगा।

पड़ोसी आएगा और कहेगा -“अरे,पंचानन बाबू ! आप अभी तक सोए हैं ! आज का अख़बार आपने देखा है? मानो सभी अख़बारों ने आप पर विशेषांक ही निकाल दिया है। यह देखिए, माननीय मुख्य अतिथि द्वारा आपकी झाॅंकी के उद्घाटन की रंगीन तस्वीरें ! बग़ल में तमाम मेहमानों द्वारा अवलोकन के मनोहारी दृश्य और सबसे नीचे दर्शकों की लंबी क़तारें!अरे,वाह! इस दूसरे अख़बार ने तो कमाल ही कर दिया! इसने झाॅंकी से संबंधित विद्वानों के एक-एक शब्द को कितने क़रीने से सजाया है।

तब तक दूरदर्शन वाले भी आ गये। वे इसे अपने दर्शकों के लिए कैमरे में समेटना चहते हैं। पर मैंने साफ़ मना कर दिया। आकाशवाणी की बात और है, पर उसे भी मैंने सिर्फ़ अगले माह प्रसारित होने वाली ‘ज़िले की चिट्ठी’ में शामिल करने की अनुमति दी है। हाॅं, एक सिने प्रोड्यूसर ने मुझसे ज़रूर साइन करवाया है। वह देश गौरव पर एक टेली फ़िल्म बनाना चाहता है। मैंने उसे झाॅंकी को शामिल करने की अनुमति दे दी है। आप चाहें तो प्रोड्यूसर से बात कर सकते हैं।

आज रात उसका सोना बड़ा कठिन था। अनंत निशा में रह-रहकर वह चौंक उठता। हड़बड़ा कर इधर-उधर झाॅंकने लगता और फिर ‘दोहर’ में मुॅंह छुपा कर सोने का उपक्रम करता।उधर देहरी पर बैठा उलूक मानो मुॅंह बनाता और उसका साथ देने झीॅंगुर और दादुर आवारा चेहल-क़दमी करते हों । इसी बीच पपीहे को उसके प्रीतम की याद सताने लगी। पर मुर्गा अभी भी अपने खोपा और सूरज क्षितिज की परतों में कहीं दुबका पड़ा था। पर जब उनके सुगबुगाने की बेला हुई तो सुबह के सुषुप्ति पवन में पंचानन की आंखें लग गयीं।

बंद आंखों से उसने देखा कि उसे देखते ही पड़ोसी ने अपनी बतकही का विषय बदल लिया है और अपने परिहास पूर्ण ठहाके को बदले हुए विषय से जोड़ने का असफल प्रयास कर रहा है। पंचानन का सशंकित मन इसे भाॅंप गया। गुस्से से उसकी आंखें लाल-पीली और चेहरा विकृत हो गया। पैर पटकते हुए वह अपने घर में घुस आया था। यहाॅं उसके गुस्से का शिकार उसकी परवश पत्नी हो गयी। मैं आसमान को ज़मीन पर और ज़मीन को आसमान पर टिकाने को कहा था,तुमने क्यों नहीं किया? बोलो ! बोलती क्यों नहीं हराम…!

इस तरह उसके चीखने-चिल्लाने से उसके परिवार वाले घबरा गए थे। पत्नी ने उसका हाथ पकड़ कर झिंझोड़ा। “नींद में इस तरह बड़बड़ा क्यों रहे हैं?”

“मैंने बड़ा ही बुरा सपना देखा है लाल परी।” वह बिछौने से उठ बैठा था। खपरैल से धूप छनकर नीचे आ रही थी। जिससे उसकी आंखें चौंधिया गयीं। “कल वाली झाॅंकी पर लोग ठिठिया रहे थे। उनकी कनफुसकी मैंने साफ-साफ सुनी है।” पंचानन विकल हो उठा था।

पर उसने हार नहीं मानी। धीरे-धीरे वह अपनी पस्त- हिम्मत को समेटने,संभालने लगा था। एक बार फिर वह अगले उपलब्धि-दिवस की अपनी योजना में मशगूल रहने लगा था। मानो किसी चक्रव्यूह की फ़त्ह की चिंता उसे खाए जा रही थी। दिन-रात मगज़-भिड़ान से वह इस नतीजे पर पहुॅंचा था कि क्यों नहीं ख़ुद ही एक आईन निकाला जाये। आईने झाॅंकी या आईने गौरव पुत्र या आईने पद्म विभूषण आदि किसी नाम से। नहीं-नहीं! वह ख़ुद ही अपने विचारों को आडे़-तिरछे काटता रहा। शीर्षक थोड़ा आकर्षक होना चाहिए। जैसे …? जैसे षड्-दर्शन ! हाॅं, यह नाम ठीक रहेगा।

उसने षड्-दर्शन शीर्षक से ख़ुद ही एक आईन प्रकाशित किया था। जिसमें झाॅंकी के कई दृश्य, मुख्य अतिथि सहित तमाम वाचकों के उत्तम उद्गार छापे गये। इतना ही नहीं,नियत तिथि को उसके लोकार्पण के लिए वह अड़ भी गया। “अरे,हटो-हटो ! आईन का एक बंडल लिए वह मंच पर चढ़ना चाह रहा था। पर मंच के स्वयं-सेवकों ने हॅंसी-हॅंसी में उसे टाल दिया। इस हॅंसी और इंकार ने जैसे उसे चिढ़ा दिया। “बड़े चले हो मंच के सेवक बनने ! तुम्हें पता नहीं गधे, मैं प्रधान स्वयं सेवक हूॅं,तुम्हारा बाप !” वह ठेलते-ठालते मंच पर जा पहुॅंचा था। मंच से देश गौरव का गुणगान चल रहा था। लोग-बाग सुनने में विभोर ! इस बीच पंचानन का मंच पर पहुॅंचना और मेहमानों से उसकी कनफुसकी कई लोगों को खलने लगी थी।

पूरे हठयोग के बावजूद अपनी दाल गलती ना देख वह मुख्य अतिथि के पैर में लटक गया। “हुजूर, मुझ पर रहम कीजिए! ईश्वर आपका भला करेगा। मैंने सूद के रुपये से यह आईन छपवाया है। यदि आज इसका बंधन ना खुला तो लोग इसे सूघेंगे भी नहीं। माय-बाप मैं बेमौत मारा जाऊॅंगा। घर के खूॅंटे उखड़ जाएंगे।”

‌ मुख्य अतिथि ने उसे ग़ौर से देखा,मानो उसके चेहरे पर लीचड़पना पढ़ना चाह रहे हों। “अरे,तो मैं परगाॅंवाॅं इसमें क्या कर सकता हूॅं? यह समागम तुम लोगों का,आतिथेय तुम्हारा और मैं…?”

‌ “हुजूर! यदि आप कह दें तो अध्यक्ष जी ज़रूर मान जाएंगे।”

पंचानन की धृष्टता से मुख्य अतिथि किंकर्तव्य विमूढ़ हो गए थे। सचिव ने उनकी इस दुविधा को भाॅंप लिया था। उन्होंने लपक कर माइक थाम लिया और कुछ कठोर घोषणाएं कीं। जिससे पंचानन तिलमिला उठा। “मेरी बिल्ली मुझ से ही म्याऊं! इस ससुरे सचिव के लिए मैंने कितने बेलन बेले। समिति के चुनाव में इनके विरोधियों को धमकाया,तटस्थों को प्रलोभित किया और समर्थकों को ठोक-ठाक कर मुखर बनाया, तब कहीं जाकर आप सचिव बन पाये! उसका यह इनाम!” पंचानन मन-ही-मन भनभनाया। “आप अपने को सहस्रबाहु समझते हैं क्या? आपके जैसे सचिव मेरे…!”

सचिव मानो पहले से तैयार बैठे थे। उन्होंने भी टके-सा जवाब दे दिया। “मैंने तो तुम्हारा ऋण पिछले साल ही चुका दिया था। अब एक मुस्टंडै के कितने मोल वसूलना चाहते हो ? तुम्हारी झाॅंकी क्या थी, गोबर का चोथ ! तुम इस मुगालते में न रहो कि लोगों ने झाॅंकी में गूलर के फूल देख लिये।”

इस बीच कई स्वयं-सेवक ऊपर जाकर उसे बज़बरदस्ती हाथ-पाॅंव से पकड़ कर नीचे उतारने लगे। पंचानन गुर्राया -“ख़बरदार !हरामजादे मैं तुम लोगों का प्रधान हूॅं। सबका कार्ड रद्द कर दूॅंगा।”

“…इसीलिए तो झुला रहा हूॅं प्रधान जी।” वे सभी उसे लेकर उतर गये। झूला झूलो कृष्ण कन्हैया

बाप मिला न मिली है मैया

गोकुल के ग्वालन संग झूलों

कदम ताल की मृदुल छैया

झूला झूलो कृष्ण कन्हैया!

हार-पछड़ कर वह अलग हो गया था। बाद में गाॅंव की गतिविधियों से मानो उसे संन्यास ही मिल गया। पर उसके अष्टक दिमाग़ में चैन कहाॅं था! उसने ज़िले के एक अन्य संघ से संपर्क किया था। उससे वह खूब रोया।”देखिए महाराज, गाॅंव की समिति वालों का अन्याय ! ये दुष्ट समिति वाले देश गौरव को गाॅंव में क़ैद कर देना चाहते हैं। मैं उनका वंशज हूॅं। मैंने ख़ून की पुकार पर यह ठाना है कि देश गौरव को गाॅंव-कुआं से निकाल कर जनपद-सागर तक ले जाऊॅं। इसलिए मैं चाहता हूॅं कि गाॅंव के समानांतर एक भव्य समागम की शुरुआत हो।” वे इसकी बातों में आ गये। इस तरह देश गौरव के स्मरण हेतु समानांतर समागम का वपन हुआ।

नियत तिथि को भाड़े पर एक क्रक धूम ढोल ताशा पार्टी को बुलाया गया था। उसने खूब धूम-धड़ाका किया। पंचानन के आईन का बंधन खुला और जमकर प्रवंचना पाठ भी हुआ। इस सफ़लता से वह फूला ना समाया । उसके पैर ज़मीन पर न पड़ते और वह अपना क़द कुछ बढ़ा हुआ महसूस करने लगा था। पर शायद यह उसके लिए काफ़ी ना था। अतः अभी से ही वह अगले साल की मनमुखी मंत्रणा में रहने लगा। ऐसा क्या हो सकता है जो देश गौरव की पाॅंत में मुझे भी खड़ा कर दे। इन लोगों का माथा तो मूॅंड़ ही लिया,क्या संभव नहीं कि इनके मूॅंड़े हुए माथे पर चढ़कर दोमुॅंहा राग आलापें। एक से आत्म प्रशस्ति और दूसरे से समिति वाले चित! यदि ऐसा हो कि अगले उपलब्धि- दिवस पर एक संवाद संगोष्ठी मैनेज करें तो यह संभव है। हाॅं-हाॅं, क्यों नहीं ! इस शुभ विचार में आगे-पीछे क्या !

पंचानन के मन में कई विषय आए पर वे सभी उसके लुब्ध मन को तुष्ट नहीं कर पाते। वह एक ही विषय को कई शीर्षकों से कागज़ पर लिखता। हाॅं, यह शीर्षक ठीक लगता है, ‘पद्म विभूषण देश गौरव के संदर्भ में षड्-दर्शन की महत्ता और नयी पृष्ठभूमि की तलाश’ , यही सबसे उपयुक्त विषय रहेगा। इससे बेचारे देश गौरव का काम चल जाएगा और संघ का भी,समिति वाले भी चित और अपनी तो चाॅंदी-ही-चाॅंदी ! मानो दोनों हाथ में लड्डू ।”

पंचानन ने उक्त विषय के साथ संघ के सचिव,अध्यक्ष और बाक़ी सदस्यों से अलग-अलग बातें कीं। उनके मन की बातें लीं और फिर ख़ुद चुप हो गया। जब समागम का समय निकट आया तो संघ बैठा भी। इस बार मुख्य अतिथि के रूप में राजधानी के श्रेष्ठ पत्रकार और देश गौरव के समकालीन चतुर्भुज विश्वकर्मा को बुलाने का निर्णय लिया गया। सदस्यों से नये सुझाव भी माॅंगे गये,पर पंचानन के अलावा किसी ने कोई सुझाव नहीं दिया। “श्रीमान्, मेरा एकमात्र सुझाव है। मुझे आशा और विश्वास है कि इसे उपस्थित सभी सम्मानित सदस्यगण मान लेंगे।” पंचानन ने भूमिका बाॅंधी।

‌ “अरे भाई,पहले अपना महान् सुझाव कहिए तो सही ! यदि पसंद आया तो आपकी निराशा और अविश्वास के बावजूद सुझाव मान लिया जाएगा।”अध्यक्ष ने मज़ाक किया तो सभी ठट्ठा कर हॅंस पड़े। पल भर के लिए बैठक की संजीदगी दूर हो गयी।

“जी, हाॅं ! वही तो कहने जा रहा हूॅं। मेरा कहना है कि उपलब्धि-दिवस समागम की सदारत हमारे सम्मानित अध्यक्ष श्री त्रिवेणी मित्रा और संचालन श्री युगल हजारिका करें।” पंचानन ने लार गटकते हुए यह एक सुर में कह गया।

“नहीं-नहीं! मान्य परंपरा के अनुसार यह कार्य संघ से बाहर के लोगों को ही करना चाहिए।” मित्रा जी ने उसके सुझाव को नकारा।

पर सचिव ने संघ और सद्भाव के हित में पंचानन का पक्ष लिया। “परंपरा तो कोई शाश्वत चीज़ नहीं। वह तो व्यक्तित्व का अनुचारी होती है। परंपरा पदचिह्नों पर चलती है, जबकि व्यक्तित्व पद चिह्न छोड़ते हैं। आज से एक नयी परंपरा का श्रीगणेश हो अथवा इस साल अपवाद ही सही।”

अतः त्रिवेणी मित्रा और युगल हजारिका के नाम पर स्वयं उन दोनों के विरोध के बावजूद सर्व सम्मति हो गई थी। लोग अपने-अपने घर को प्रस्थान कर गये। पर पंचानन वहाॅं से सीधे रेलवे स्टेशन गया था। जहाॅं उसने समागम के अगले दिन के लिए सप्त क्रांति एक्सप्रेस से राजधानी के लिए तीन आरक्षित टिकट खरीदे। घर आकर उसने पत्नी को बताया था कि दिल्ली चलने की तैयारी करनी है।

नियत तिथि को बड़े धूमधाम से देश गौरव का समागम शुरू हुआ। मुख्य अतिथि मसनद के सहारे बैठे थे। अतर से सराबोर गजरे उनके आगे मुस्कुरा रहे थे। जिसे उन्होंने अभी-अभी अपने गले से उतारकर यथा स्थान रखा था। बालाएं गा रही थीं। हे आगत,स्वागत स्वीकार करो

श्रद्धा सिंचित यह हार धरो।

जड़-चेतन है मद मोहित आज,

इस मिट्टी का मनुहार परहो !

सदारती वाचन समाप्त कर मित्रा जी मुख्य अतिथि की बग़ल में आकर बैठ गये। उनके दूसरी ओर सचिव पहले से बैठे थे। मित्रा जी के बैठते ही हजारिका ने माइक संभाल लिया। उनके पाॅंव प्रकम्पित हो रहे थे और तालु बराबर सूख जाते। बमुश्किल उन्होंने अपनी जीभ चलाई और मुॅंह को तर किया। ‘पद्म विभूषण देश गौरव के संदर्भ में षड्-दर्शन की महत्ता और नयी पृष्ठभूमि की तलाश’ विषय पर क्रमशः कई लोगों को बोलना था। अतः हजारिका ने पहले एक स्थानीय वाचक का नाम पुकारा। उनके आते ही वे मित्रा जी की बगल में बैठ गये। सचिव के चेहरे का भाव पहले ही वक्रित हो चुका था। हजारिका के बैठते ही वे उबल पड़े।

“यह क्या तमाशा हो रहा है? कथित संगोष्ठी कैसे शुरू हो गयी? यह तो पहले से तय एजेंडे में नहीं थी ‌।”

“मैंने तो अध्यक्ष जी के आदेश से आरंभ किया है।” संचालक हजारिका ने छद्म भाव से कहा।” आप अध्यक्ष जी से मुॅंह मिला लीजिए।”

“धत ! मुझे तो पंचानन ने ही आकर अभी-अभी कहा कि आपने ही संगोष्ठी की स्वीकृति दी है,फिर मुझे क्या आपत्ति हो सकती थी।” इस पर अध्यक्ष ने खुलासा किया।

” पर पंचानन है कहाॅं?”

“अभी तो यहीं बैठा था। लगता है…”

“वह कहीं नहीं गया। देखिए,नीचे दर्शकों के बीच शोभायमान है। सबै नचाबै पंचरूपी ! सारा षड्यंत्र रचाकर,पूरे अनुष्ठान में स्वयं स्थापित होकर वह किस तरह निष्कलुष बना बैठा है।” सचिव ने एक शांत आह भरी।

“पर षड्-दर्शन किस चिड़िया का नाम है,यह मुख्य अतिथि क्या जानें? जब उन्होंने कथित महान् ग्रंथ को देखा तक नहीं, वह क्या ख़ाक विचार व्यक्त करेंगे!” सचिव ने फिर बेचैनी व्यक्त की।

तब तक स्थानीय वाचकों का क्रम समाप्त हो चुका था। संचालक ने लपककर माइक थाम लिया। उन्होंने मुख्य अतिथि के सम्मान में नज़्में कहीं। उसकी लयात्मकता पर लोग ‘वाह-वाह’ करने लगे। उनकी तालियां रुकीं तो मुख्य अतिथि ने अपना वाचन शुरू किया।

‌ “देवियों एवं देव जनों! इस सत्समागम के संदर्भ में आपके कई पत्र मिले थे। भाई पंचानन का सद्प्रयास षड्-दर्शन भी मिला। बाद के दबाव पत्र में पंचानन ने बार-बार आग्रह किया कि मैं पूरी तैयारी के साथ आऊॅं,ताकि आज के विषय पर सांगोपांग प्रकाश डाल सकूॅं। मुझे पंचानन की विनम्रता, कर्मठता और समर्पणता से अत्यंत खुशी हुई।

मुझे बहुत ख़ुशी हुई कि देश गौरव के प्रति लोगों की भक्ति और श्रद्धा बढ़ती जा रही है। मुझे ख़ुशी इसलिए भी हुई कि पंचानन जैसे नये लोग,नयी पौध,नयी पीढ़ी देश गौरव से अनुप्राणित हो रही है। मेरी अशेष बधाइयां,शुभेच्छाएं और मंगल कामनाएं आपके साथ हैं। आप लोगों के साथ हैं और सदा रहेंगी‌।”

मुख्य अतिथि के वाचन विराम के साथ समागम समाप्त हो गया। लोग उठ गये। तभी पंचानन नीचे से उछलकर मंच पर आ गया और खाली पड़े माइक से जय घोष करने लगा। “देश गौरव अमर रहें! चतुर्भुज विश्वकर्मा दीर्घायु हों! उपलब्धि-दिवस सफ़ल रहा।” आदि-आदि। इधर छूटते ही सचिव ने पंचानन को घेरा। इस पर बड़े ही औचित्य पूर्ण ढंग से झाड़ते हुए पंचानन ने कहा-” मैंने तो अध्यक्ष जी से पूछ लिया था। उनकी सहमति से ही संगोष्ठी शुरू की गई थी।”

“पर सिर्फ़ अध्यक्ष कौन होते हैं अकेले निर्णय लेने वाले?” सचिव ने उसके जवाब पर आपत्ति की।

तब तक मुख्य अतिथि ‘ठहराव’ में जा चुके थे। तभी अध्यक्ष त्रिवेणी मित्रा सहित कई सदस्य उन लोगों के बीच आ गये। पंचानन ने सभी लोगों को एक जगह देखकर ही मानो अमोघ अस्त्र छोड़ा। “क्या संघ में अध्यक्ष का कोई अधिकार नहीं?”। इस पर सचिव ने क्षण भर के लिए झेंप महसूस की। जिसे अध्यक्ष ने परख लिया था। उन्होंने तत्क्षण उसे डाॅंट दिया। “यह क्या बचपना है! क्या तुम्हें पता नहीं संघ में अध्यक्ष और सचिव की अलग-अलग क्या भूमिकाएं होती हैं?”

इससे जहाॅं सचिव ने राहत महसूस की,वहीं पंचानन और मुखर हो गया।”छोड़िए-छोड़िए! मुझे जानने की ज़रूरत भी नहीं।मुझे अपने नौलखे संघ से अलग ही समझिए।आज से ही मैं स्वतंत्र हूॅं।”

सप्त क्रांति एक्सप्रेस द्रुत गति से कई हॉल्ट और केविन को क्षणों में लांघती हुई बढ़ी जा रही थी। पंचानन; चतुर्भुज विश्वकर्मा के पायताने में कर जोड़े बैठा था।”हुज़ूर, मैं पंचानन विश्वकर्मा हूॅं, देश गौरव के गाॅंव का वासी ।

“अरे, तुम विश्वकर्मा हो, फिर मुझको अपने पत्रों में शर्मा क्यों लिखते रहे?” विश्वकर्मा जी ने बीच में ही टोकते हुए पूछा।

“सरकार! अब आपसे क्या छिपाना,इस ज़िले में शर्माओं का वर्चस्व है । हमारे देश गौरव भी शर्मा ही थे। अतः उनकी बिरादरी में झूठा सम्मान पाने के लिए ही मैंने ऐसा किया था। पर आज आपके चरणों का प्रसाद पाकर हमें अपनी अहमियत महसूस हुई। विश्वकर्मा बिरादरी की महत्ता समझ में आयी। पर यहाॅं के लोगों ने मात्र मेरे विश्वकर्मा होने के कारण मुझे दूध की मक्खी समझा।”

“देश गौरव शर्मा थे या क्या थे, यह तो मैं उनके वर्षों के सान्निध्य में नहीं जान पाया।”

“माई-बाप, अपने सर की क़सम खाता हूॅं ,वह शर्मा थे और मैं विशुद्ध देशवाली विश्वकर्मा हूॅं। पर शर्माओं ने मुझे सिर्फ़ इसी कारण अपनी आंख की किरकिरी समझ कर आगे नहीं बढ़ने दिया।”

“अच्छा यह छोड़ो ! हाॅं, बताओ कल के समागम में तुम कहीं नज़र नहीं आये?”

पंचानन उनके पाॅंव दबाने लगा। “जी मालिक, यही तो रोना है। मैं तो बछड़े की तरह छटपटाता रहा,पर ये शर्मा के बच्चे मुझे आपसे मिलने ही नहीं दिये।

फिलहाल तो मेरी प्रार्थना है कि शयनयान-सात में नौ,दस और ग्यारह कुल तीन शायिकाओं का मेरा आरक्षण है। कृपा पूर्वक आप भी वहीं चलें तो मुझे आपकी शुश्रूषा का पुनीत सौभाग्य मिलगा।”

“अरे पंचानन, तुमने तीन वर्थ क्यों बुक कराये और कौन लोग हैं तुम्हारे साथ?”

“जी स्वामी, एक मेरे भगवान् आपके लिए, दूसरा मेरी अति सुंदरी भार्या के लिए और तीसरा इस नाचीज़ सेवक के लिये।”

“अरे, तुम तो ग़ज़ब के आदमी हो। मुझे तो तुम रहस्यवादी भी लगते हो।” विश्वकर्मा जी ने आश्चर्य व्यक्त करते हुए कहा था।

“बस! अब आपकी दया निधि दृष्टि की ज़रूरत है श्री- श्री एक सौ आठ श्री…!” पंचानन आज अपने शब्दों के सभी जादू चला देना चाहता था।

xxx

चतुर्भुज विश्वकर्मा ने एक अख़बार में उसे प्रूफ रीडिंग के लिए रखवा दिया था। यह उसका सुर्खरूपना ही था कि उसे अपार्टमेंट्स में एक कोना भी मिल गया था। अचानक मुझे अपने दरवाज़े पर खड़े देख कर वह बौखला गया। शायद उसे अपनी पोल खुलती नज़र आई हो । उसने मुझे जल्द-से-जल्द विलगाने की मंसा से ही झूठ बोला था। इस द्वैत भाव ने उसके प्रति मेरी धारणा को ही पुख्ता किया था। मुझसे हाथापाई करने में ही वह गिरकर घायल हो गया था।

 

– – कला कौशल ( बिहार )

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