जगदीश प्रसाद मण्डल का व्यक्तित्व: एक साहित्यिक, सामाजिक और सांस्कृतिक मूल्यांकन
लेखक: पल्लवी मण्डल
मैथिली साहित्य के आधुनिक परिदृश्य में यदि कोई नाम अपनी अनुपम सृजनशीलता, समाज से निकट संबंध और सांस्कृतिक प्रतिबद्धता के कारण विशिष्ट रूप से चिन्हित होता है, तो वह हैं—जगदीश प्रसाद मण्डल। उनका व्यक्तित्व केवल एक साहित्यकार के रूप में सीमित नहीं है, बल्कि वह एक कृषक, समाजसेवी, आंदोलनकारी, विचारक और यथार्थवादी लेखक के रूप में भी व्यापक विस्तारित है। यह लेख उनके जीवन, संघर्ष, साहित्यिक यात्रा और कृतित्व का समग्र आंतरिक मूल्यांकन करता है, साथ ही उनके अद्वितीय व्यक्तित्व का उद्घाटन भी करता है।
यात्रा: अनुभवों से पूर्ण भौगोलिक विस्तार
जगदीश प्रसाद मण्डल जी की यात्रा केवल स्थान परिवर्तन नहीं, बल्कि अनुभवों से भरा आत्मसंपृक्त विस्तार था। छात्र जीवन में हिंदी साहित्य के विशाल संसार से जुड़े रहने वाले मण्डल जी ने अपने ज्ञान के क्षितिज को विस्तार देने के लिए देश के विभिन्न भागों की यात्रा की। सर्वप्रथम त्रिपुरा में पदस्थ अपने मित्र कालिकांत झा (आईपीएस) के निमंत्रण पर वह पूर्वोत्तर भारत की सांस्कृतिक भूमि से परिचित हुए। इसके साथ ही उन्होंने नगालैंड, अरुणाचल प्रदेश और असम के ग्रामीण-पर्वतीय जीवन का अनुभव किया, कह सकते हैं कि इससे उनकी संवेदना को व्यापकता मिली।
इसके अतिरिक्त, हैदराबाद में वामपंथी राजनीतिक-साहित्यिक सम्मेलन, मुंबई की औद्योगिक नगरी, कोलकाता का शांतिनिकेतन, पश्चिम बंगाल का सुंदरवन, गंगासागर, ओडिशा का कोणार्क, और राजस्थान का जैसलमेर से लेकर केरल के कोच्चि तक—जहां वह अपने कथा संग्रह ‘गामक जिनगी’ के लिए टैगोर लिटरेचर अवार्ड प्राप्त करने गए थे—सभी यात्राएं उनकी लेखनी को वैश्विक दृष्टिकोण प्रदान करती हैं।
साहित्यिक कृतित्व: यथार्थ का जीवंत दस्तावेज
2000 ई. के बाद मण्डल जी ने अपने साहित्यिक जीवन को पूर्णतः समर्पित कर दिया। प्रारंभिक पांच वर्षों तक प्रकाशन को लेकर संघर्ष रहा, किंतु 2008 से दिल्ली स्थित ‘श्रुति प्रकाशन’ और बाद में निर्मली (सुपौल) स्थित ‘पल्लवी प्रकाशन’ ने उनके लेखन को व्यापक मंच प्रदान किया। उनके सृजन में अब तक 82 कथा संग्रह, 20 उपन्यास, 11 नाटक और 12 कविता संग्रह के अतिरिक्त निबंध, आलोचना एवं लेखों की पुस्तक ‘पयस्विनी’ प्रकाशित हो चुकी है—जो मैथिली साहित्य में एक अप्रत्याशित योगदान के रूप में मान्य है।
उनके कथा संग्रह जैसे- ‘गामक जिनगी’, ‘स्वतंत्र व्यक्तित्व’, ‘विचारक मोड़’, ‘विश्व शांति’, ‘संचरण’—सामाजिक और राजनीतिक सच्चाइयों को पाठकों के समक्ष निर्भीकता से प्रस्तुत करते हैं। उपन्यास जैसे—‘पंगु’, ‘मौलाइल गाछक फूल’, ‘उत्थान-पतन’, ‘जीवन संघर्ष’—यथार्थवाद की ऊँचाइयों को स्पर्श करता है।
विशेष रूप से ‘पंगु’ उपन्यास मण्डल जी के यथार्थवादी दृष्टिकोण, कृषि चिन्तन, पीढ़ीगत संघर्ष, और मिथिलांचल के ग्रामीण जीवन के गहराइयों को प्रस्तुत करता है। उपन्यास के पात्र ‘देवचरण’ और ‘हरिचरण’ पीढ़ी दर पीढ़ी अपनी कृषि जीवित रखने को संघर्ष के प्रतीक बनते हैं। पारिवारिक जिम्मेदारी, सामाजिक मूल्य, कृषि का टूटता परम्परा, और नव सोच- इस उपन्यास में यह सब गूंथा हुआ है मण्डलजी का सोच समाजवादी पक्ष और समाज-संवेदनशीलता को उजागर करना है। हरिचरण के मेहनत और नव प्रयोग के संग उसके अपने ही गांव में रहकर खेती का मॉडल बनाने का संकल्प, इस बात का गवाही है कि लेखक स्वयं कृषक रहते हुए भी किसान के पीड़ा, संकल्प और संघर्ष को कितने अधिक प्रमाणित रूप में उकेरें हैं
नाटक जैसे—‘मिथिलाक बेटी’, ‘पंचवटी’, ‘विरांगना’—में स्त्री चेतना और लोक संस्कृतिक जीवन की जीवंत प्रस्तुति मिलती है। कविता संग्रह—‘इंद्रधनुषी आकाश’, ‘गीतांजलि’, ‘अकास गंगा’, ‘कामधेनु’ आदि—में भाषा, भाव और विचार का परिपक्व संगम दिखाई देता है।
भाषा-शैली: यथार्थ की सहज भाषिक अभिव्यक्ति
मण्डल जी की लेखन शैली मौलिक और विशिष्ट है। वह ग्राम्य बोली, स्थानीय मुहावरे(फकड़ा) और लोक जीवन के दृश्यों को सहज भाषा में जीवंत कर देते हैं। उनकी भाषा उतनी ही सहज, स्वाभाविक और प्रभावशाली है जितनी जीवंत; उनके संवाद और दृश्य। कथाओं में वे समय-संदर्भ की विस्तृत व्याख्या, पात्रों की मनोस्थिति और परिवेश को वे गहराई से चित्रित करते हैं। ऐसा लगता है कि इसमें वह लेखक नहीं, बल्कि पात्र के रूप में स्वयं ही उपस्थित हैं।
‘पंगु’ उपन्यास की भाषा जहाँ आंतरिक आत्मसंघर्ष को उद्घाटित करती है, वहीं ‘मौलाइल गाछक फूल’ में प्रेम, पीड़ा और सामाजिक असंतुलन की त्रिवेणी भावनात्मक रूप से गुंफित मिलती है। उनकी शैली में कोई आडंबर नहीं है, बल्कि यह जीवन का निर्विकार प्रतिबिंब है।
पुरस्कार और सम्मान
मंडल जी की साहित्यिक यात्रा मात्र संख्यात्मक नहीं, बल्कि गुणात्मक और प्रतिबद्धता आधारित है। उन्हें भारत सरकार का प्रतिष्ठित ‘साहित्य अकादमी पुरस्कार’ (2021), ‘टैगोर लिटरेचर अवार्ड’ (2011), ‘अमर शहीद रामफल मंडल सम्मान’, ‘मिथिला शिखर सम्मान’, ‘यात्री चेतना पुरस्कार’ और ‘विदेह सम्मान’ सहित अनेक राष्ट्रीय व क्षेत्रीय सम्मान प्राप्त हो चुके हैं। विशेष उल्लेखनीय बात यह है कि ‘पंगु’ उपन्यास के लिए ही मण्डल जी को ‘साहित्य अकादमी’ पुरस्कार दिया गया है। खैर, यह सम्मान उनके यथार्थवादी साहित्य दृष्टि को सर्वोच्च मान्यता प्रदान करता है।
‘सगर राति दीप जरय’: आत्मीयता से जुड़ा साहित्यिक मंच
जगदीश प्रसाद मण्डल ‘सगर राति दीप जरय’ साहित्यिक मंच से आत्मीय रूप से जुड़े हैं। 2008 में मधुबनी के रहुआ-संग्राम में आयोजित कथा गोष्ठी में उनकी उपस्थिति के साथ मैथिली लेखक समुदाय में उनकी पहचान हुई। 2010 में अपने गांव बेरमा में इस गोष्ठी का आयोजन कर उन्होंने अपने सामाजिक-साहित्यिक उत्तरदायित्व का सफल निर्वहन किया। मंच की निरंतर सहभागिता, नवलेखकों का प्रोत्साहन, और अपने 130 पुस्तकों का लोकार्पण इसी मंच से करना उनके सांस्कृतिक समर्पण की पुष्टि करता है!
निष्कर्ष:
जगदीश प्रसाद मंडल केवल एक लेखक नहीं, बल्कि एक विचारधारा, एक आंदोलन और एक सामाजिक दृष्टि हैं। उनके व्यक्तित्व के विभिन्न आयाम हैं, जैसे वह एक शिक्षक न होकर शिक्षाप्रदाता बनना, लेखक न होकर सृजनकर्ता बनना, समाजसेवी न होकर समाज में परिवर्तन के वाहक बनना। उन्हें एक विराट व्यक्तित्व में परिणत करता है। मैथिली साहित्य को उनके रूप में एक संकल्पशील, सामाजिक-सजग और यथार्थवादी रचनाकार प्राप्त हुआ है, जो आनेवाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का स्थायी स्रोत रहेंगे!!