‘प्रिय प्रकृति‘
तुम बिल्कुल सच हो ‘प्रिय प्रकृति’
मैं देखती हूं तुम्हें
जब भी खाली होती हूं
मैं महसूस करती हूं
जब भी अकेली पड़ती हूं
सब देखते हैं तुमको…
अपने अलग-अलग रूपों में
कभी धूप में, कभी छांव में
कभी बादलों में तो कभी कोहरे में
महसूस भी करते हैं तुम्हें
कभी अपनी साँसों में
कभी अपनी तन्हाईयों में।
हर किसी के साथ अपने तरीके से
चलती हो तुम
हर किसी के सपने को
अपने गर्भ में पालती हो तुम
किसी के झूठ को भी इनकार नहीं
सच का भी कोई सलाहकार नहीं
तभी तो तुम सच हो ‘प्रकृति’
यह बात आज के दौड़ में कोई आम नहीं..!!
– पल्लवी मंडल
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