शरद पूर्णिमा | शीला तिवारी

शरद पूर्णिमा

 

शरद पूर्णिमा धवल चाँदनी

शुभ्र श्यामल घन घनानंद

मधुर रात्रि की दिव्य पयस

पसर रही थल मधुर सुगंध

 

यमुना पुलिन आकुल आज

कण-कण प्रमुदित कृष्ण राग

दूध नहायी चांद अमृत बरसात

गोपी गीत गुंजित तल आकाश

 

चंद्र सोलह कला में सुज्जित

उतर रहा अप्रितम रस आज

ब्रज रज पावन पीयूष प्रेम धन

रासपूर्णिमा अद्वितीय प्रिय संग

 

गोपी कृष्ण व कृष्ण गोपी

जप -तप कृष्ण‌,रास रंग कृष्ण

कृष्ण-कृष्ण और बस कृष्ण

ब्रज धाम मंडल अनुपम दिव्य

 

– शीला तिवारी

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Sonal

Wow, what a beautiful poem!

Govind Shukla

Bahut hi sundar rachna hai. Aap se agey bhi is platform per kavita likhte rehne ki prarthana hai.