स्वप्न ख़ज़ाना, एक बेहतरीन हिंदी कहानी

स्वप्न खजाना

करीब दस साल की दुर्गा डरी-सहमी पलंग के बीचों-बीच अपने दोनों पैरो के बीच मुँह डाले बेठी है और अपने चारों ओर बैठे रिश्तेदारों को बारी-बारी से देखे जा रही है और दूसरी ओर सभी रिश्तेदार हैरान परेशान से दुर्गा को देख रहे हैं, मानो अजूबा देख लिया हो । दुर्गा के पापा ने कहा – “देखा! तुम्हारी बेटी ऐसी हॉरर फिल्में देख-देखकर रात को डरावने सपने देखा करती है और फिर चिल्ला-चिल्लाकर हमें इकट्ठा कर लेती है । यह सिलसिला कब तक चलेगा दुर्गा की माँ?” दुर्गा के पास बैठी उसकी माँ रामेश्वरी देवी ने हाथ के इशारे से दुर्गा के पिताजी हरिराम प्रसाद को चुप रहने को कहा ।

दुर्गा के दादाजी काफी देर से पैर पर पैर चढ़ाए पीठ का सहारा लिए कुर्सी पर बैठे दुर्गा को एकटक देखे जा रहे थे और अपनी लम्बी सफेद दाढी पर हाथ फेरे जा रहे थे। तभी वे भारी आवाज में बोल पड़े-” देखो … दुर्गा बेटा ! जरा विस्तार से सारी बातें एक बार फिर से बताओ तो” दुर्गा ने डरते डरते कहना शुरू किया “वो….वो …. दादाजी।”
“बोलो बेटा डरो नहीं……. हम सब हैं न यहाँ।” दादाजी ने ढाढस बंधाते हुए दुर्गा से कहा ।
दुर्गा धीरे धीरे बोलने लगी -” दादाजी….. मैंने रात को सपने में देखा कि एक आदमी, जिसके सफेद बाल और सफेद दाढ़ी थी…… और उसके कपड़े…… कपड़े भी सफेद थे । वे बोले…. ’बेटा… सुनो मैं तुम्हे बहुत सारा धन देना चाहता हूं। यह धन तुम्हारा ही है ,तुम्हे डरने की आवश्यकता नहीं है । मैं हर क्षण तुन्हारे आस- पास ही हूँ ।” इतना कहकर दुर्गा थोड़ी देर रुकी और फिर बोलने लगी “तब मैंने उनसे पूछा कि सारा धन कैसे मिलेगा ?’
तो वे बोले – ‘यहीं पास ही में एक घर है और उसके पास हैंडपम्प भी है।’
मैंने कहा ‘हाँ है, ….तो?’
वे बोले – ‘तो तुम्हें दिन के ठीक बारह बजे वहां जाना है, जब सूर्य देवता ठीक सिर पर होंगे, तब उस घर की परछाईं तिरधि पड़ेगी और उसी परछाई के दोनों कोणों पर निशान लगाकर आ जाना और रात को जाकर वहीं खुदाई करना, तुम्हें ढेर सारा धन मिलेगा। लेकिन ध्यान रहे, तुम्हें वहाँ अकेले ही जाना है ।’ मैंने घबराते हुए कहा, ‘लेकिन… बाबाजी मुझे अकेले रात को डर लगता है, मैं….. मैं तो इतनी छोटी हूँ ,..मै कैसे??’ तो वे हँसते हुए बोले- ‘नहीं बेटा तुम अकेली नहीं हो, मैं हूँ न तुम्हारे साथ’

मैंने बाबाजी से पूछा- “किन्तु बाबाजी इतना सारा धन मैं कहाँ रखूगीं ? वे बोले ‘तुम निश्चिन्त रहो पुत्री, मैं तुम्हारे धन की आजीवन रक्षा करूंगा ।’ ऐसा कहकर वे चले गए । उनसे बात करते हुए ऐसा लगा, मानो… मानो वे, साक्षात् मेरे सामने खड़े होकर मुझसे बातें कर रहे हों ।’ कहते-कहते दुर्गा जैसे अपने स्वप्न में ही खो गई ।
” हूं…….” दादाजी गहरी सोच में डूब गए ।
“पिताजी आप जानते हैं न यह तो बच्ची है और बच्चे कितने काल्पनिक होते हैं। मैं कह रहा हूं कि यह दिन भर इसके हॉरर मूवीज देखने का ही नतीजा है ।” हरिराम प्रसाद ने अपनी बात पर जोर देते हुए कहा । दादाजी ने दुर्गा से सवाल किया ” बेटा ! क्या तुम्हें इससे पूर्व भी इस किस्‍म के स्वप्न आए हैं ?”
“हाँ दादा जी ! कई बार और हर बार मुझे उन्हीं धन वाले बाबा जी का ही स्वप्न आया है। …….अपना खेत वाला मन्दिर है न दादाजी ?”
“हाँ….तो?”
“दादा जी! आपको तो पता ही है कि मैं वहाँ कभी नहीं गई, लेकिन फिर भी मुझे उन स्वप्न वाले बाबाजी ने बताया ।
“क्या बताया..?” दादा जी ने उत्सुकता के साथ पूछा।
“यही कि तुम्हारे शिव मन्दिर के सामने एक मिट्टी से बनी एक पुलिया है और थोड़ा आगे जाने पर एक गहरी खाई है, उसमें धन मिलेगा ।”
”फिर तुम गई वहाँ ?” दादा जी की आँखें उत्सुकता से भर उठीं।
“नहीं दादाजी! माँ ने यह कहकर मना कर दिया कि वो जगह सुरक्षित नहीं है ।” दुर्गा ने निराश होकर कहा “इसके अलावा भी दादाजी उन्होंने मुझे कई जगहों के नक्शे बताए, जहाँ धन था, लेकिन मैं नहीं गई ।” ……और दुर्गा उन सभी जगहों के नक्शे दादाजी को विस्तार से बताने लगी और दादाजी आश्चर्य के साथ दुर्गा की बातें सुनने लगे। जैसे जैसे दुर्गा उन सभी स्वप्नों के बारे में बता रहीं थी, दादाजी की आँखों की पुतलियाँ चौड़ी होती जा रही थी । उन्हें विश्वास नहीं हो पा रहा था कि स्वप्न में बताई गई सभी जगह एकदम सही थीं और दुर्गा कभी भी नक्शे वाली जगहों पर नहीं गई यह भी सत्य था । लेकिन यह कैसे हो सकता है ? भला स्वपन सच कैसे हो सकते हैं ? कमरे में बैठा हर एक शख्स इसी उधेड़बुन में था । कमरे में काफी देर तक सन्‍नाटा पसरा रहा, फिर सन्नाटे को तोड़ती हुई दादाजी की आवाज गूंजी – “ठीक है दुर्गा ! हम एकबारगी तुम्हारे स्वप्न पर विश्वास करके देख लेते हैं, हालांकि हम में किसी को भी इस तरह के स्वप्नों पर विश्वास नहीं लेकिन एक बार स्वप्न पर विश्वास कर लेने में बुराई भी नहीं है । तुम आज ही जाकर बताए गए नक्शे के अनुसार परछाई पर निशान लगा आना।”
“लेकिन पिताजी……”हरिराम कुछ बोल पाते उससे पहले ही दादाजी ने उन्हें चुप रहने का इशारा किया और खड़े हो गए और हरिराम को अपने साथ बाहर आने का इशारा करते हुए कमरे से बाहर निकल गए ।
” क्या पिताजी आप भी…, दुर्गा तो बच्ची है, कुछ भी बोल सकती है, लेकिन हम उसकी हर बात मानने लगे, तो उसका यह पागलपन बढ़ता चला जाए‌गा” हरिराम ने दादाजी के पीछे – पीछे चलते हुए कुछ गुस्‍से व चिन्ता के साथ यह बात कही । दादाजी रूके और मुड़कर अपने बेटे के कन्धें पर हाथ रखकर बोले । “देखो बेटा! कभी-कभी समस्या को सुलझाने के लिए समस्‍या का साझीदार बनना पड़ता है ।” यह कहते हुए दादाजी के होठों पर रहस्यमयी मुस्कान बिखर गई।
“मै…. मैं कुछ समझा नहीं पिताजी ।”
“देखो बेटा! अगर हम दुर्गा की बात मानकर वैसा ही करेंगे जैसा कि उसे बार-बार स्वप्न आते हैं, तो हो सकता है कि उसका यह पागलपन धीरे-धीरे खत्म हो जाए और इस बात की सच्चाई का भी हमें पता चल जाएगा कि आखिर दुर्गा के स्वप्नों में कितनी सच्चाई है?” इतना कहकर दादाजी वहाँ से चले गए और हरिराम उनको जाते हुए देखते रहे।
दिन के ठीक बारह बजे दुर्गा अपनी बड़ी बहन लक्ष्मी के साथ स्‍वप्‍न बाबा के बताए नक्‍शे पर निशान लगाने गई तो उसने देखा कि सूर्य देवता ठीक सर के ऊपर थे लेकिन ,बाबा द्वारा बताए गए मकान की परछाईं तिरछी थी। यह देखकर लक्ष्मी ,जो दुर्गा से लगभग चार वर्ष बड़ी थी, हैरान परेशान थी, लेकिन वह चुप रही और वे दोनों चुपचाप वापस घर आ गई । रात आठ बजे सभी परिवार वाले उसी स्थान पर कुदाली, फावड़ा, व गैंती के साथ पहुंच गए और वहाँ पूजा करके दुर्गा खुदाई करने लगी । फिर उसका भाई और बड़ी बहन भी बारी बारी से खुदाई करने लगे । कुछ समय निरन्तर खुदाई करने के पश्चात दुर्गा का भाई नरेश के चीखने की आवाज वहाँ खड़े सभी लोगों ने सुनी और सब नरेश की ओर देखने लेंगे, जो घुटनों के बल खुदाई के स्थान के पास हाथों में मिट्टी लिए, अपलक मिट्टी को ही देखे जा रहा था। सभी ने नरेश से एक स्वर में पूंछा -“क्या हुआ.. !!”
नरेश बोला -“मैंने अभी कुछ सोने के सिक्के देखे, किन्‍तु पलक झपकते ही वे गायब हो गए…. ये कैसे हुआ?” दुर्गा के पिताजी कुछ दूरी पर बड़ी देर से यह सब देख रहे थे, – ” अरे! ये सब क्या लगा रखा है यहाँ कुछ नहीं है, चलो यहाँ से ।”
दुर्गा अपने पिता से याचना करते हुए बोल पड़ी- “पापा! बस थोडी देर…।”
दुर्गा के पिता कुछ बोले नहीं और चुपचाप दुर्गा को ही देखते रहे।

इस बार फिर खुदाई शुरू हुई और इस बार दुर्गा व नरेश दोनों ने सिक्के को बाहर आते देखा और दोनों एक साथ चीख पड़े। किन्तु इसके पश्चात् भी सिक्‍के हाथ नहीं आ पाए । कुछ समय तक खुदाई कर लेने के पश्चात् भी कुछ भी हाथ नहीं आ पा रहा था । थक-हारकर ये सब अपने घर की ओर चल पड़े ।घर आते ही दुर्गा के पिता ने दुर्गा को समझाया कि “देखो बेटा! अब अपने स्वपन पर विश्वास कभी मत करना। स्वप्न हमेशा सच नहीं होते ।ये तो हमारी कल्पना मात्र है । जैसा हम सोचते हैं हैं,वैसा ही हमारे जीवन में घटित होता है ।”
दुर्गा को लगा शायद पापा सही कह रहे हैं । यह सब उसका भ्रम भी हो सकता है। यही सब सोचते सोचते रात काफी हो चुकी थी और दुर्गा भी सोने का प्रयास कर रही थी, लेकिन निंद्रा उसकी आंखों से कोसों दूर थी । उसे रह-रहकर स्वप्न बाबा और उनकी कही बाते याद आ रही थी । आज घटित घटनाओं के बारे में सोचते-सोचते दुर्गा गहरी नींद के आगोश में समा गई ।
अगली सुबह दुर्गा हड़बड़ाकर उठ बैठी और फटी आंखों से अपने चारों और देखने लगी । तभी दुर्गा को पुकारती हुई दुर्गा की मां रूपा देवी उसके कमरे में आ पहुंची । दुर्गा के पीले पड़ चुके चहरे को देखकर रूपा देवी ने धीरे से अपना हाथ दुर्गा के कंधे पर रखा तो दुर्गा चौक पड़ी ।
“माँ … आप?” दुर्गा ने नजरें उठाकर रूपादेवी को देखा
“हां बेटा। क्या बात है ? तुम घबराई हुई सी क्यों हो?”
“मॉं मुझे आज फिर स्वप्न बाबा दिखाई दिए। ”
“क्या..? आज फिर से ….क्या कहा उन्होंने ?”
‘मां उन्होंने मुझे कहा कि तुम्हे धन निकालने अकेले जाना चाहिए था और उन्होंने इस बार मुझे एक नया नक्शा बताया है ।”
” क्या बताया?” रूपा देवी ने उत्सुकता से प्रश्न किया।
” यहाँ से थोड़ी दूरी पर एक खेत के पास मिट्टी की बनी हुई एक बड़ी पुलिया है और उसी पुलिया पर एक बहुत बड़ी कढ़ाई मिट्टी में दबी हुई है, बस उसका एक हिस्सा बाहर है, जिस पर एक सर्प हमेशा रहता है । उन्होंने कहा कि तुम जाओगी तो वह सर्प वहाँ से चला जाएगा और तुम धन निकाल लेना।”
“क्‍या….? ” रूपा देवी अवाक होकर दुर्गा की सारी बातें सुन रहीं थी ।

“मां क्या यह नक्शा सच है?”
“हां बेटा! यह सच है, ऐसी पुलिया भी है और वह कढाई भी है लेकिन मैं तुझे वहाँ भेज नहीं सकती क्योंकि मुझे डर है कि कही वह सर्प तुझे डस ना ले और दूसरी तरफ तेरे पापा भी वहाँ जाने की इजाजत नहीं देगें।”
इस घटना के पश्चात् हर रात दुर्गा के स्वप्न में बाबा आते रहे और उसे धन निकालने के लिए कहते रहे, नए नए नक्‍शे बताते रहे ,किन्तु दुर्गा धन निकालने की हिम्मत नहीं कर पाई और अगर हिम्मत की भी तो उसके पापा ने इस बात की इजाजत नहीं दी ।
आज दुर्गा बहुत बड़ी हो चुकी है और पुरानी यादें उसे कचोटा करती हैं । वह स्वप्न बाबा की बातों को सत्य माने या मात्र स्वप्न मानकर भूल जाए । वह आज भी समझ नहीं पा रही । यदि स्वप्न बाबा सच में हैं, तो क्या वे आज भी दुर्गा की मदद करेंगे ? या दुर्गा को बीती बातों को बुरा स्वप्न समझ कर भूल जाना चाहिए? किन्तु यह सब कुछ दुर्गा के लिए इतना सरल नहीं है और शायद वह कभी भी स्वप्न बाबा को भूल नहीं पाएगी।

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