नव्या: एक दैवीय स्पर्श
हिमालय की गोद में बसा वह छोटा सा गाँव ‘नीलगिरि’ अपनी शांत वादियों और घने जंगलों के लिए जाना जाता था। इसी गाँव की मिट्टी में नव्या का बचपन पनपा। वह कोई साधारण बारह वर्ष की बच्ची नहीं थी। जहाँ उसकी उम्र की अन्य सहेलियाँ गुड़ियों के खेल और गाँव की पगडंडियों पर दौड़ने में व्यस्त रहतीं, नव्या अक्सर गाँव के पुराने मंदिर के चबूतरे पर बैठी पाई जाती।
नव्या के घर का वातावरण आध्यात्मिक था। उसके दादाजी एक संस्कृत विद्वान थे, जिनकी विरासत नव्या ने बहुत छोटी उम्र में ही सहेज ली थी। जब वह मात्र आठ साल की थी, तब उसने शिव पुराण की कथाओं को कंठस्थ कर लिया था। दुर्गा सप्तशती के जटिल श्लोकों का उच्चारण वह इतनी शुद्धता और लय के साथ करती कि सुनने वाले मंत्रमुग्ध रह जाते। उसके लिए ईश्वर कोई अमूर्त शक्ति नहीं, बल्कि एक सखा की तरह थे जिनसे वह मन ही मन बातें किया करती। उसकी आँखों में एक ऐसी गहरी स्थिरता थी, जो उसकी उम्र से कहीं ज्यादा बड़ी जान पड़ती थी।
। वह सावन की एक धुंधली शाम थी। आकाश में काले बादलों का डेरा था और हल्की बूंदाबांदी हो रही थी। नव्या रसोई में अपनी माँ की मदद कर रही थी, तभी अचानक आँगन से एक हृदयविदारक चीख सुनाई दी।
दौड़कर बाहर देखा तो नव्या के पिता ज़मीन पर गिरे हुए थे और अपना दायाँ पैर थामे दर्द से छटपटा रहे थे। पास ही एक काला विषैला बिच्छू रेंगता हुआ अंधेरे में ओझल हो गया। उस बिच्छू का ज़हर इतना तीव्र था कि देखते ही देखते पिता का पैर नीला पड़ने लगा और उनके माथे पर पसीने की बूंदें चमकने लगीं।
गाँव के लोग इकट्ठा होने लगे। कोई कहता कि डॉक्टर के पास ले जाओ (जो कि दस कोस दूर था), तो कोई कहता कि किसी तांत्रिक को बुलाओ। पिता का दर्द असहनीय होता जा रहा था, उनकी आँखें फटने को थीं।
नव्या अपनी जगह जड़ खड़ी यह सब देख रही थी। अचानक, उसके भीतर एक अजीब सी शांति व्याप गई। उसे अपने गुरुजी की बात याद आई— “पुत्री, मंत्र केवल शब्द नहीं, ऊर्जा हैं, यदि उन्हें पूर्ण विश्वास के साथ पुकारा जाए।”
वह निर्भीक होकर पिता के पास घुटनों के बल बैठ गई। उसने कांपते हुए स्वर में पिता से पूछा, “पापा, मैं आपका यह कष्ट कैसे बाँटूँ? मुझसे आपकी यह पीड़ा देखी नहीं जा रही।”
पीड़ा से कराहते हुए पिता ने कहा, “बेटा, यहाँ गाँव में तो सब झाड़ा ही लगवाते हैं… शायद ईश्वर को यही मंज़ूर है।”
नव्या ने दृढ़ता से कहा, “तो फिर मैं कोशिश करूँगी।”
उसने अपने कोमल हाथ पिता के उस स्थान पर रखे जहाँ बिच्छू ने डंक मारा था। उसने अपनी आँखें बंद कीं और साक्षात माँ दुर्गा का ध्यान धरते हुए उन मंत्रों का जाप शुरू किया जो उसने बचपन में सीखे थे। उसकी बुदबुदाहट में एक अलौकिक लय थी। जैसे-जैसे वह मंत्र पढ़ती गई, उसे महसूस हुआ कि उसके हाथों से एक हल्की सी गर्माहट निकलकर पिता के शरीर में प्रवेश कर रही है।
आस-पास खड़ी भीड़ शांत हो गई। अगले दस मिनट तक केवल नव्या के मंत्रों की गूंज और बारिश की टिप-टिप सुनाई दे रही थी। अचानक, पिता ने एक लंबी और चैन की साँस ली। उनके चेहरे की शिराएँ, जो तनाव से खिंची हुई थीं, ढीली पड़ने लगीं। उन्होंने धीमे से कहा, “नव्या… रुकना मत बेटा। जलन कम हो रही है। ऐसा लग रहा है जैसे कोई शीतल जल की धारा मेरे पैर से बह रही है।”
नव्या के चेहरे पर एक सात्विक तेज चमक उठा। यह उसके विश्वास की पहली जीत थी, जिसने एक साधारण लड़की को ‘वैद्य’ और ‘साध्वी’ के बीच के एक अनूठे मार्ग पर खड़ा कर दिया था।
नव्या के उस पहले चमत्कार ने गाँव की सीमाओं को लांघकर एक ऐसी लहर पैदा कर दी थी, जिसकी कल्पना स्वयं नव्या ने भी नहीं की थी। कहानी का अगला भाग उसके जीवन के संघर्ष, प्रसिद्धि और विज्ञान व विश्वास के बीच झूलते हुए मन को दर्शाता है।
पिता के ठीक होने की खबर जंगल की आग की तरह फैल गई। पहले तो गाँव वालों को लगा कि यह महज़ एक इत्तफाक था, लेकिन जब पड़ोस की चाची का पुराना वात-रोग (गठिया) नव्या के सिर पर हाथ रखने से शांत होने लगा, तो लोगों के मन में घर कर गया कि इस बच्ची की जीभ पर स्वयं सरस्वती और हाथों में धन्वंतरि का वास है।
अब नव्या का घर एक साधारण घर नहीं, बल्कि एक सिद्ध स्थान बन गया था। सुबह सूरज की पहली किरण के साथ ही दरवाज़े पर भीड़ जमा हो जाती। लोग बैलगाड़ियों, ट्रैक्टरों और मीलों पैदल चलकर अपनी गठरी में उम्मीदें बाँधकर आने लगे। नव्या को अब खेलने का समय नहीं मिलता था। स्कूल से आते ही वह बस्ता किनारे रखती और उन पीड़ितों के बीच बैठ जाती। वह किसी से पैसे नहीं लेती थी, बस शांत भाव से अपनी आँखें बंद करती और मंत्रों के साथ उस व्यक्ति की पीड़ा को सहलाने लगती।
समय बीता और नव्या गाँव की पाठशाला छोड़कर शहर के कॉलेज में पढ़ने गई। उसने विज्ञान (Biology) को अपना विषय चुना। वह जानना चाहती थी कि मानव शरीर कैसे काम करता है। कॉलेज की लैब में वह जब सूक्ष्मदर्शी (Microscope) से कोशिकाओं को देखती, तो उसके मन में एक युद्ध छिड़ जाता।
एक तरफ विज्ञान कहता था कि ‘न्यूरोलॉजिकल रिस्पॉन्स’ और ‘एनाटॉमी’ ही सत्य है, दूसरी तरफ उसकी अपनी हकीकत थी जहाँ दवाइयाँ हार जाती थीं और उसके मंत्र जीत जाते थे।
कॉलेज के सहपाठी उसे ‘चमत्कारी लड़की’ कहकर चिढ़ाते, तो कभी कौतूहल से देखते। नव्या अक्सर रात को अपनी माँ की गोद में सिर रखकर पूछती:
“माँ, मैं जो करती हूँ, क्या वह वाकई सच है? कॉलेज में प्रोफेसर कहते हैं कि बिना औषधि के कोई ठीक नहीं हो सकता। पर जब मैं उन लोगों को देखती हूँ जो महीनों से अस्पताल के चक्कर काट रहे थे और मेरे पास आकर मुस्कुराने लगते हैं, तो मेरा विज्ञान फेल हो जाता है। क्या मैं लोगों को भ्रम में रख रही हूँ?”
माँ उसके सिर को सहलाते हुए कहती, “बेटा, विश्वास भी एक तरह का विज्ञान है जिसे अभी तक प्रयोगशालाओं में नहीं मापा जा सका। अगर तेरा स्पर्श किसी की रात की नींद लौटा रहा है, तो वह झूठ कैसे हो सकता है?”
नव्या की ख्याति अब कॉलेज की पढ़ाई पर भारी पड़ने लगी थी। लोग अब केवल दिन में ही नहीं, बल्कि आधी रात को भी उसके हॉस्टल या घर के बाहर गुहार लगाने पहुँच जाते। नव्या की ममता ऐसी थी कि वह चाहकर भी किसी को मना नहीं कर पाती थी। कभी-कभी वह इतनी थक जाती कि उसकी आँखें नींद से बोझिल हो जातीं, पर बाहर किसी बच्चे के रोने की आवाज़ उसे मंत्र जपने पर विवश कर देती।
उसके पिता अब उसे गर्व से देखते। वे कहते, “बेटा, तू अब केवल मेरी बेटी नहीं है, तू इस इलाके की ‘प्राण-शक्ति’ है। ईश्वर ने तुझे माध्यम चुना है, और माध्यम कभी थकता नहीं है।“
एक बार शहर के एक प्रसिद्ध डॉक्टर, जो इन सब बातों को ‘अंधविश्वास’ मानते थे, अपनी पत्नी को लेकर आए जिसे एक दुर्लभ स्नायु रोग (Nerve disease) था। डॉक्टर ने हर संभव इलाज कर लिया था, पर कोई सुधार नहीं था। नव्या ने उन्हें देखा। उसने कोई दावा नहीं किया, बस अपना वही पुराना तरीका अपनाया—पूरी श्रद्धा के साथ ईश्वर का ध्यान किया और महिला के कांपते हुए हाथों को अपने हाथों में ले लिया।
दो घंटे की प्रार्थना और स्पर्श के बाद, जब उस महिला ने बिना किसी सहारे के अपनी चाय का कप उठाया, तो डॉक्टर की आँखों में आँसू थे। उन्होंने नव्या से पूछा, “यह कौन सी विद्या है?”
नव्या ने बड़ी सरलता से उत्तर दिया, “डॉक्टर अंकल, यह विद्या नहीं, ‘विश्राम’ है। विज्ञान शरीर को ठीक करता है, और शायद ईश्वर का नाम मन को उस स्थिति में ले जाता है जहाँ शरीर खुद को ठीक करना शुरू कर देता है।“
नव्या अब समझ चुकी थी कि उसकी शक्ति मंत्रों में कम, और पीड़ित के प्रति उसकी ‘करुणा’ में ज्यादा है। वह जान चुकी थी कि वह कोई जादूगरनी नहीं, बल्कि एक ऐसी ‘सेतु’ है जो बिखरते हुए इंसानी विश्वास को फिर से उम्मीद से जोड़ देती है।
समय का पहिया घूमता रहा और नव्या की कॉलेज की शिक्षा पूर्ण हुई। अब वह एक शालीन, विदुषी और शांत युवती के रूप में निखर चुकी थी। जब उसके माता-पिता ने उसके विवाह का निर्णय लिया, तो पूरे नीलगिरि गाँव में एक अजीब सी खामोशी छा गई। जैसे ही यह खबर फैली कि नव्या का विवाह पास के शहर के एक युवक से तय हुआ है, गाँव वालों के चेहरे उतर गए।
लोगों के मन में कोई ईर्ष्या नहीं थी, बल्कि एक गहरा डर था—“जब यह चली जाएगी, तो हमारे दुखों का बोझ कौन हल्का करेगा? जब आधी रात को किसी के प्राण संकट में होंगे, तो वह सांत्वना भरा स्पर्श कहाँ मिलेगा?”
गाँव के बुजुर्गों का एक समूह नव्या के पिता के पास पहुँचा और रुँधे हुए गले से बोला, “साहू जी, बिटिया को विदा मत कीजिए। वह इस गाँव की रक्षक है।“ पिता की आँखों में भी आँसू थे, पर उन्होंने धीमे से कहा, “वह एक चिड़िया है, जिसका अपना एक आसमान भी है। उसे अपनी गृहस्थी तो बसानी ही होगी।“
जिस दिन नव्या की विदाई थी, उस दिन नीलगिरि गाँव में किसी के घर चूल्हा नहीं जला। गाँव के हर रास्ते पर लोगों की कतारें खड़ी थीं। नव्या जब अपनी लाल चुनरी में डोली की ओर बढ़ी, तो मंजर देखने लायक था। वह लोग जिन्हें नव्या ने कभी ठीक किया था, रास्ते में अपनी अपनी पीड़ाओं को भूलकर उसके लिए दुआएं मांग रहे थे।
एक बूढ़ी दादी, जिसे नव्या ने सालों पहले लकवे के दर्द से राहत दिलाई थी, कांपते हाथों से उसके सिर पर हाथ रखकर रो पड़ीं। नव्या ने अपनी सिसकियाँ रोकते हुए सबका अभिवादन किया। उसने महसूस किया कि वह केवल एक बेटी के रूप में विदा नहीं हो रही थी, बल्कि एक पूरी संस्कृति की उम्मीदें उसके साथ जा रही थीं।
उसने अपने पिता के पैर छुए, तो उन्होंने कान में बस इतना ही कहा:
“बेटा, स्थान बदलने से शक्ति नहीं बदलती। तुम जहाँ रहोगी, वहीं गंगा बहेगी।“
नव्या का विवाह जिस युवक से हुआ, वह स्वयं एक इंजीनियर था और प्रगतिशील विचारों का था। नव्या को डर था कि शायद उसके इस ‘काम’ को ससुराल में अंधविश्वास मानकर रोक दिया जाएगा। लेकिन उसके पति ने एक दिन उसे शांत बैठकर सुना और कहा:
“नव्या, मैंने लोगों की आँखों में तुम्हारे प्रति जो कृतज्ञता देखी है, वह किसी ढोंग से पैदा नहीं हो सकती। विज्ञान शायद आज इसे न समझ पाए, पर तुम्हारी ‘करुणा’ ही वह ऊर्जा है जो लोगों को स्वस्थ करती है। तुम अपना यह सेवा का कार्य कभी मत छोड़ना।“
नव्या के मन का आखिरी द्वंद्व भी समाप्त हो गया। उसे समझ आ गया कि मंत्र और स्पर्श केवल माध्यम थे, असली शक्ति तो उसकी ‘सेवा भावना’ और ‘निस्वार्थ प्रेम’ में थी।
आज भी नव्या अपने नए घर में उसी निष्ठा से लोगों की सेवा करती है। अब उसके पास केवल बिच्छू के काटे हुए लोग ही नहीं आते, बल्कि वे भी आते हैं जो मानसिक तनाव, अवसाद और जीवन की आपाधापी से टूटे हुए होते हैं।
वह अब भी मंत्र बुदबुदाती है, अब भी लोगों के सिर पर हाथ रखकर उन्हें सहलाती है। वह जानती है कि अस्पताल दवा दे सकते हैं, पर वह जो देती है, वह है—‘भरोसा’।
आज नव्या के चेहरे पर वह चकित होने वाला भाव नहीं रहता जो कॉलेज के दिनों में था। अब जब कोई उससे पूछता है कि यह सब कैसे संभव है, तो वह बस मुस्कुराकर कहती है:
“जब दवा और दुआ एक ही बिंदु पर मिल जाते हैं, तो उसे ही लोग चमत्कार कहते हैं। मैं बस उस बिंदु की एक साक्षी हूँ।“
नीलगिरि गाँव आज भी उसे याद करता है, पर नव्या ने सिद्ध कर दिया कि सेवा की कोई भौगोलिक सीमा नहीं होती। वह जहाँ है, वहीं एक छोटा सा स्वर्ग है, जहाँ लोग रोते हुए आते हैं और अपनी पीड़ा पीछे छोड़कर
, चेहरे पर एक बड़ी सी मुस्कान लिए विदा होते हैं।
– डॉ. पीतांबरी