प्रेम, प्रतीक्षा और आसमां – गगन कुमार की खूबसूरत कविता

भोर की तू भास्कर है रात की तू चन्द्रमा
तेरे बिना सुना-सुना लगता है आसमा ,
अंखियो के काजरो से दिन भी अन्धेरा हुआ
जुल्फों की घटा तेरी ,झरती है कालिमा |

नैन तेरे कजरा रे ,होठ पे है लालिमा
बोल तेरे लागे जैसे बजती हो वीणा ,
चाल तेरा देख कर के बहका है मेरा मन
लगता है बोतलों से हो गया सामना |
तेरे बिना सुना-सुना लगता है आसमा |

अधरों की प्यास हो तुम सुबह की उबास तुम
तेरे बिना सुना- सुना लगता है ये जहाँ ,
राह तेरी तकता हूँ घरी को निहारता हूँ
हो न जाए देर कहीं सो न जाए आसमा |
तेरे बिना सुना-सुना लगता है आसमा |

राही कोई भटके न रूप तेरा देख कर
राह पर अपनी दुपट्टा को संभालना ,
चलते चलते जिन्दगी की राह में जब थक जाये
पांव मेरे थिरके वो गीत तुम सुनाना |
तेरे बिना सुना-सुना लगता है आसमा |

घर की तुम लक्ष्मी हो सब की तुम मालकिन
तेरे बिना देखो ये वीरान लगे अंगना ,
छन -छन ,छुन -छुन बजते है तेरे पायल
तुम मेरी प्रियतम हो मै तेरा सजना |
तेरे बिना सुना-सुना लगता है आसमा |

-गगन कुमार

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