“शिव शंकर”
पनघट है पनिहारी को ,
हिमाचल की राज दुलारी को ।
शांत स्वर में बह चले,
जल शिव सलिला प्यारी को।
घट घट में बसते शिव ही हैं,
कंत पार्वती पवित्र दुलारी को।
मन मधु रस पीने चले,
ममता की मूर्त महतारी को।
चलो कैलाश की ओर चले,
दर्शन को भोले भंडारी को।
मात गिरजा वहां विराजे,
संग गजानन त्रिपुरारी को ।
संहार करे शिव शंकर,
जीव संतुलन करने को ।
नर उतना चले खिलौना,
जितना चाबी भरने को ।
– शेरसिंह ढिकवाल ( घायल)
पचेरी बड़ी झुंझुनूं राजस्थान