गांव, घर, खलिहान, परिपक्वता से भरी देवेंद्र की ” शर्वरी ” हिंदी कविता

शर्वरी

वो निशा, वो निशानाथ की मृदुल कौमुदी,

वो कूलंकषा का कूल, वो गाँव की गर्मियाँ।

प्रवाहित जलराशि पर ज्योत्स्ना का वितान,

वो क्षणदा में क्षणप्रभा सी उद्वेलित उर्मियाँ ।

 

झुरमुटों से उलझना, विटपों पर फिसलना,

फसलों को सहलाना, बिखरना स्थल पर ।

वो तृणों को बहलाना, चमकाना कण-कण,

वो चाँदनी, उसका थिरक जाना उछल कर ।

 

वो तन-मन के घावों पर मरहम लेपन-सा,

उसका यूँ तिक्त-मधुर स्मृतियों का जुटाना।

वो नयनों का निहारना छपाकर छवि को,

उसका सहज भाव से अंतर में उतर आना ।

 

वो मुख की मुस्कान, वो दीप्ति नयनों की,

वो हर्षित मन, वो खेतों की सौंधी सुगन्ध ।

वो स्पंदन रोम-रोम में, वो मंद शीतल पवन,

स्वच्छंद दिक्, विचरता मैं काट लोक-बन्ध ।

– देवेन्द्र कुमार

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