शर्वरी
वो निशा, वो निशानाथ की मृदुल कौमुदी,
वो कूलंकषा का कूल, वो गाँव की गर्मियाँ।
प्रवाहित जलराशि पर ज्योत्स्ना का वितान,
वो क्षणदा में क्षणप्रभा सी उद्वेलित उर्मियाँ ।
झुरमुटों से उलझना, विटपों पर फिसलना,
फसलों को सहलाना, बिखरना स्थल पर ।
वो तृणों को बहलाना, चमकाना कण-कण,
वो चाँदनी, उसका थिरक जाना उछल कर ।
वो तन-मन के घावों पर मरहम लेपन-सा,
उसका यूँ तिक्त-मधुर स्मृतियों का जुटाना।
वो नयनों का निहारना छपाकर छवि को,
उसका सहज भाव से अंतर में उतर आना ।
वो मुख की मुस्कान, वो दीप्ति नयनों की,
वो हर्षित मन, वो खेतों की सौंधी सुगन्ध ।
वो स्पंदन रोम-रोम में, वो मंद शीतल पवन,
स्वच्छंद दिक्, विचरता मैं काट लोक-बन्ध ।
– देवेन्द्र कुमार