सखा मेरे
क्या लिखूं सखा मेरे तेरे बारे में
आज कुछ जमा नहीं पा रही हूं
कविता अधूरी लगती है, तेरे बिना,
तुझ पर कितना लिखूं ?
कहां तक तुझे पढ़ती रहूं
नाम से तेरे शुरुआत करती हूं
शब्द हमेशा ही कम लगते हैं,
मैं खुद-ब-खुद हंसने लगती हूं।
मेरा मन तेरे पास आकर रुक जाता है
जागते हुए सपने देखती हूं तुम्हारी
तेरी यादों में खो जाती हूं,
मन भर आता जैसे बादल।
इच्छा होती है प्यास बुझाने की
जरुरत के समय तुम पास नहीं रहते
तब,
इच्छा होती है जी भर के रोने की।
– अच्युत उमर्जी
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