एक था घोड़ा
एक घोडे का हुआ जन्म, इंसानों की बस्ती में पला,
बढ़ा वो उनके साथ ही, बस मस्ती ही मस्ती में
देखा उनको ही जब से आंखे पाई,
समझा उन्हीं को उसने जब से बुद्धि आई।
रहन-सहन बाते उसकी इंसानों जैसी ही,
सीख ली जीने की सब आदते भी वैसी ही।
खाने लगा वो टेबल कुरसी पर बैठकर,
बोलने लगा सबसे ही घमंड में ऐठकर ।
चलने लगा वो मोटरसाईकिल और कार से,
समझने लगा ये थके पैर है बेकार से।
बैठने लगा वो दिनभर मोबाइल, टीवी के साथ में,
सोता था दिनभर और जगता रहता रात में।
एक दिन जंगल में अटक गई कार, भटक गया घोड़ा,
न पाकर किसी को आस-पास, हुआ परेशान थोडा ।
अचानक देखा उसने कुछ और घोड़े सरपट भागते,
कार और बाइक से भी तेज दूरी नापते ।
सब आपस में थे हंसते-बोलते चलते
एक-दूसरे के साथ मिलकर हरी-हरी घास चरते।
खुश थे सब घोड़े अपनी आजादी में
सब एक से एक थे, एक जैसी आबादी में
जान लिया था, समझ लिया था , उन्होंने कि वे कौन है?
जी रहा था जो दूसरों की जिंदगी, वो घोड़ा अब मौन है…
भाग नहीं सकता था वो क्योंकि उसने जाना ही न था,
अपने कौशलों को उसने कभी पहचाना ही न था।
देखना, जानना, समझना उसने छोड़ दिया था,
छोड़ा, क्योंकि सोचा ही नहीं कि ऐसा मोड़ आएगा।
– ममता श्रीवास्तव ( लखनऊ )
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