1 –
मुझ को मारा है हर इक दर्द ओ दवा से पहले,
दी सज़ा इश्क़ ने हर जुर्म-ओ-ख़ता से पहले।
2 –
अब तो उन की याद भी आती नहीं,
कितनी तन्हा हो गईं तन्हाइयाँ।
3 –
अक़्ल में यूँ तो नहीं कोई कमी,
इक ज़रा दीवानगी दरकार है।
4 –
असर भी ले रहा हूँ तेरी चुप का,
तुझे क़ाइल भी करता जा रहा हूँ।
5-
बहसें छिड़ी हुई हैं हयात ओ ममात की,
सौ बात बन गई है ‘फ़िराक़’ एक बात की।
6 –
छलक के कम न हो ऐसी कोई शराब नहीं,
निगाह-ए-नर्गिस-ए-राना तिरा जवाब नहीं।
7-
एक मुद्दत से तिरी याद भी आई न हमें,
और हम भूल गए हों तुझे ऐसा भी नहीं।
8-
तो एक था मिरे अशआ’र में हज़ार हुआ,
उस इक चराग़ से कितने चराग़ जल उठे।
9-
‘फ़िराक़’ दौड़ गई रूह सी ज़माने में,
कहाँ का दर्द भरा था मिरे फ़साने में।
10-
हम से क्या हो सका मोहब्बत में,
ख़ैर तुम ने तो बेवफ़ाई की।
11-
ख़ुश भी हो लेते हैं तेरे बे-क़रार,
ग़म ही ग़म हो इश्क़ में ऐसा नहीं।