Govind ki Kalam Se – रिश्तों और सफर की सच्ची झलक

1 –

चाहे जहां भी रहो अपने किरदार को जिंदा रखो,

तुम चाहे यह खुद करो या इसके लिए कोई कारिन्दा रखो।

 

2 –

रास्तों पर जब आप चलेंगे, छोटे बड़े पत्थरों से भी लड़ेंगे,

कुछ पैरों से टकरा राह से दूर हटेंगे, कुछ से आप गिरेंगे।

गिरेंगे उठेंगे, संभलेंगे, चलेंगे, बहुत कुछ सीख जाएंगे,

फ़िर जानेंगे, सीखेंगे इन पत्थरों अहमियत, इन्हें समझेंगे।

 

3 –

बस तुम चलते रहो, राह मिल ही जाएगी।

 

4 –

तेरे – मेरे, इसके – उसके, सबके, घर में बसते रिश्ते,

कुछ के घरों में हंसते रहते, खुशियों में झूमते रिश्ते।

कुछ के घरों में घुटते, कुढ़ते आपस में ही लड़ते रिश्ते,

सहमी आहें, नम आंखे ‘ गोविंद ‘ कुछ तो कहते रिश्ते।

 

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