कहकशा तेरी बातों का | डॉ. मोहन तिवारी

कहकशा तेरी बातों का

 

भुलाए ना भूले कभी ,कहकशाँ तेरी बातों का

रहता है ख्यालेदिल ,जिक्र तेरी मुलाकातों का

जाने किस कदर, उतर गया है तू रूह में मेरे

छीन ही लिया है तूं, नींदोंचैन ,मेरी रातों का

 

हर बात पर ठहाके, गूंजते रहते हैं कानों में

तू चल रहा हो साथ जैसे, मेरे हर वीरानों में

तेरी इक नजर के कायल हैं हम आज भी

बन गया है तू ही मकसद, मेरी जज्बातों का

 

हर शूं में तूं ही तुं,नजर आता है क्यों बता

दी जगह दिल में तुझे ,क्या यही थी खता बता

निभा न सका साथ तो, गम नहीं इस बात का

गम है तो यही कि, था तूं सुकून चाहतों का

 

बेवफा कहूँ,जालिम कहूँ या कहूं तुझे हरजाई

लानत कहूँ, जिहालत या कहूँ इबादती तन्हाई

तुझे मिले चैन ,यह दुआ तो न कर सकूंगी मैं

तू तो रहा सौदागर फ़कत,हंसी कहकहों का

 

करती हूं माफ तुझे ,मगर कभी माफी न मिले

खता पे तेरी कभी, चमन में कोई गुल न खिले

काफिर नहीं इश्क की, यादों को लिए साथ हूँ

हयातेरुह में रहूंगी ,पाने को जवाब सवालों का

भुलाये ना भूले कभी, कहकशाँ तेरी बातों का

……………………….

डॉ. मोहन तिवारी, मुंबई

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