नाम उसने अपना समंदर रख लिया।
तलहटी में उसने सारा मंजर रख लिया।।
जो इक तालाब दिखा नियत बदल ली उसने,
पहले हँसा बहुत फिर राज अंदर रख लिया।।
बित्ता भर जमीन नहीं थी पाँव रखने को,
जब जमीन मिली तो उसे भी कह के बंजर रख लिया।।
हवा मिली तो समझा आँधियाँ भी आएँगी एक दिन,
हिफाज़त के लिये उसने बवंडर रख लिया।।
विकास वो बहुत बेरहम हो गया है संभल जरा,
पहले अपना मौका साधा फिर उसने खंजर रख लिया।।
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राधेश विकास
(प्रवक्ता),
प्रयागराज, उत्तर प्रदेश।
एक एक कपड़े उतार रहा बस
नंगा कहना बाकी है।
करके हर ज़ख्म तरोताजा बस
चंगा कहना बाकी है।
रूहानी बात करने वाले अब मत
छीन मुझसे मेरा जिस्म,
बात रूह में घर कर गयी बस साँसो को दंगा कहना बाकी है।।
……..
राधेश विकास