पिता जी, आप कितने महान हैं
पिता की ममता अल्फ़ाज़ों से परे कहानी है,
थक जाएँ लाख मगर लब पे न आहानी है।
सच्चाई से सींचा, हर सपना सजाया है,
हमारी मुस्कुराहट में अपना जहाँ बसाया है।
घर हो या दफ्तर, फ़र्ज़ को पूजा माना है,
ईमान की राह पे हर क़दम उठाया है।
संस्कार दिए, सीखा इज़्ज़त की पहचान,
दूसरों को ऊँचा देख, दिल से पाई शान।
बिन मांगे सब कुछ दे डाला, दिल से दान है,
इसी पे हमें भी फ़ख्र, यही तो अभिमान है।
मेरी हर उड़ान के पीछे दुआओं का आसमान है,
आपके भरोसे से ही तो मज़बूत मेरा इरादा है।
दुनिया जाने या न जाने, सच का यही बयान है,
पृथ्वी पर सबसे बड़ा अगर कोई नाम है—
तो वो सिर्फ़ “पिता” का ही मुक़ाम है,
पिता जी, सच में… आप कितने महान हैं।
– शिवानी पाल