फर्क पड़ता है
माना कि, फर्क नहीं पड़ता
किसी एक के होने या न होने से,
तब भी, बहुत फर्क पड़ता है
किसी के चले जाने से।
उस एक का होना भी
सरल सहज नहीं होता,
व्यक्तित्व के निर्माण का संघर्ष
एक कल्पना महज नहीं होता।
स्वेद बहता है एड़ी से चोटी तक
रक्त पिघलता है कभी हिम सा,
कभी जलाता है खुद को मशाल सा
कभी दहकता है ज्वालामुखी सा।
कैसे कहें कि फर्क नहीं पड़ता
आसान नहीं आम से खास होना,
सरल है कमा लेना अपनों के खातिर
सहन नहीं होता अपनों से ही उसे खो देना।
हठधर्मी है अतीत का भूल जाना
लापरवाही है आज का मचलना,
मगर, मूर्खता है
अपने ही घर को जलता देख मुस्कुराना।
फर्क पड़ता है उस एक के चले जाने से,
आसान नहीं अनेक के बीच उस एक का होना।
– डॉ. मोहन तिवारी, मुंबई