माँ के लिए क्या लिखूँ मैं,
मैं तो स्वयं माँ की ही लिखावट हूँ।
उसकी ममता की स्याही से उकेरी हुई,
उसके प्रेम का जीवंत प्रतिबिंब हूँ।
मैंने सदा यही जाना है,
मैं उसकी छाया हूँ, उसका विस्तार हूँ,
उसके अस्तित्व का एक अंश,
उसकी आत्मा का साकार हूँ।
कष्टों की घनघोर वर्षा में,
वो स्नेह की छतरी बन जाती है,
तपते हुए जीवन के मरुस्थल में,
वो शीतल पवन सी सहलाती है।
शायद इस संसार में मेरा होना भी,
केवल उसी के लिए है,
उसकी हर मुस्कान में बसना,
और उसके हर दुःख को हर लेना ही
मेरे जीवन का सार है।
कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी,
धैर्य का दीप जलाना उसने सिखाया,
हर अंधेरे में उम्मीद की लौ बनकर,
मुझे आगे बढ़ना उसने सिखाया।
किसी की बुरी नज़र न लगे मुझ पर,
इस डर से उसने काला टीका लगाया,
अपने हर डर को छुपाकर,
मुझे निडर बनना सिखाया।
आज भी याद आती हैं उसकी वो बातें,
जिनकी गूँज में कट जाती हैं ये रातें,
उसकी सीख, उसका स्नेह, उसका विश्वास,
मेरे हर कदम के साथ चलती हैं।
“सफर में कभी अकेला मत समझना खुद को”,
उसकी ये वाणी आज भी सहारा है,
क्योंकि माँ का प्रेम ही वो धागा है,
जो हर दूरी में भी हमें थामे रखता है।
– शिवम राही
Nice