नहीं कोई उलझन जिए जा रहे हैं,
कि ज़ख्मों को अपने सिये जा रहे हैं।
हम दर्द अपना किसको सुनाएं,
सो दर्दों को अपने पिए जा रहे हैं।
ये चमकीली दुनिया समझ के परे है,
सो इससे किनारा किए जा रहे हैं।
चलो ठीक माना कि हम हैं अकेले,
सो खुद को सहारा किए जा रहे हैं।
अपनी ही लौ से जलकर हूँ बैठा,
खुद को सदायें किए जा रहे हैं।
यूँ तो हैं मेरे दोनों हांथ खाली,
सो सबको दुआएं दिए जा रहे हैं।
झूठ की टहनी पे सच न खिलेगा,
उजड़े गुलिस्तां में कुछ न मिलेगा।
ये आँखो का दरिया समेटे रहे हम,
खोया हुआ फिर कभी न मिलेगा।
हर ज़ख्म अपना हुआ है किताबी,
यहाँ हर आईना, अब हुआ है शराबी।
सितमगर ये दुनिया भले हो खूबसूरत,
मगर इस दुनिया में बहुत है खराबी।
– शुभेन्द्र सिंह संन्यासी