1-
उकसाने पर हवा के आंधी से भिड़ गया है
मेरे चराग़ का भी मुझ – सा ही हौसला है
रातों को जागता मैं, सोता नहीं है तू भी
तेरा शग़ल है, मेरा तो काम जानना है
साहिल पर दबदबा है माना तेरा ही तेरा
लेकिन मेरा तो रिश्ता दरिया से प्यास का है
कब तक दबाये मुझको रक्खेगा हाशिये पर
मेरे वजूद से ही तेरा ये फ़लसफ़ा है
मेरी शहादतों पर इक चीख तक न उठे
तेरी खरोंच पर भी चर्चा हुआ – हुआ है
तेरे आने ही वाले महफूज़ ‘ कल ‘ की ख़ातिर
मैंने तो हाय अपना ये ‘ आज ‘ दे दिया है।
– गौतम राजऋषि
2 –
जाते हुए राही के साये में सिमटना क्या
इक पल के मुसाफ़िर के दामन से लिपटना क्या
जाते हुए क़दमों से, आते हुए कदमों से
भरी रहेगी राहगुज़र, जो हम गए तो कुछ नहीं…
3-
रोने से और इश्क़ में बेबाक हो गये
धोए गये हम इतने कि बस पाक हो गये
4 –
हरी है ये ज़मीं हमसे कि हम तो इश्क़ बोते हैं
हमीं से है हंसी सारी, हमीं पलकें भिगोते हैं
धरा सजती मुहब्बत से, गगन सजता मुहब्बत से
मुहब्बत से ही ख़ुशबू, फूल, सूरज, चांद होते हैं।
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स्रोत…
पुस्तक ~ हरी मुस्कुराहटों वाला कोलाज
लेखक – गौतम राजऋषि
प्रकाशन – राजपाल
पृष्ठ संख्या – 21, 116, 144
नोट –
लेखनशाला संस्था की ‘शब्दांजलि’ का उद्देश्य आपकी पुस्तक की सहायता से उदास चेहरों पर खुशियों की एक छोटी सी झलक दिखाना है। उन्हें कुछ बताना है, कुछ सिखाना है। यदि आपको लगता है कि आपकी पुस्तक का उपयोग करने में हमने कोई गलती की है, तो मैं आपसे व्यक्तिगत रूप से क्षमा चाहता हूं। आप हमें नीचे दिए गए ईमेल पर पोस्ट हटाने हेतु संदेश भेज सकते हैं और हमारी टीम आपकी पोस्ट को दो दिनों के अंदर हटा देगी। धन्यवाद।
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