“भ्रमण और ब्रह्मांड: जीवन के जज्बात और सवाल | अभय प्रताप सिंह की प्रेरक पुस्तक”

1 –
रंगों का त्यौहार है पर, खुशियां भी अपार है,
खिलखिलाते चेहरे जिसमें, प्यारी मुस्कान है।
ये खुशियां कुछ पलों में ही यूं ढल जाएंगी,
जब बच्चे पूछेंगे, मम्मी खाना क्या बनाएंगी?

2 –
आप पहले वाले पापा नहीं रहे, कुछ हुआ है क्या?
अब, आप भी मुझे भूल गए, बदल गए हो क्या?

3 –
वर्षा की वायु से और जश्न का उदासी से जंग चल रही हो,
ऐसी जंग जिसमें विजेता को पता हो कि वो जीत जाएगा।

4 –
दिन बीत गया किसी तरह, बाबू साहब,
बच्चों को अंधेरे से डर लगता है।

5-
‘समय को अगर समय से पहचान लो, तब तो ठीक है,
वर्ना समय जब समय दिखाता है तो बर्दास्त नहीं होता है।’

6 –
‘रात में आप जगते हो,
या रात आपको जगाती है।’

7-
प्रकाश की डायरी के कुछ पन्नें जिसके अंत में एक सवाल लिखा था जिसे पढ़ने के बाद इशिका के आखों में आंसू आ गए थे।

8 –
‘मैं जो कुछ भी था, वो बचा ही नहीं
जो बचा हूं, वो मैं कभी था भी नहीं।’

9-
‘जीवन में कभी विकल्प नहीं होने चाहिए,
विकल्पों में हम, हमेशा गलती कर बैठते हैं’।

10 –
‘वो झुकी हुई आँखें, भीगी पलकें , कांपते होंठ,
उदास चेहरा, दिल का दर्द, मानो सदमा गहरा,
और भी बहुत कुछ था।
जो लड़ रही थी अपने हक में,
उसमें कुछ अलग ही तड़प था।’
___

स्रोत…
पुस्तक ~ भ्रमण और ब्रह्मांड
लेखक ~ अभय प्रताप सिंह
प्रकाशन – प्राची डिजिटल पब्लिकेशन
पृष्ठ संख्या – 16, 19, 20, 26, 29, 39, 46

नोट –
लेखनशाला संस्था की ‘शब्दांजलि’ का उद्देश्य आपकी पुस्तक की सहायता से उदास चेहरों पर खुशियों की एक छोटी सी झलक दिखाना है। उन्हें कुछ बताना है, कुछ सिखाना है। यदि आपको लगता है कि आपकी पुस्तक का उपयोग करने में हमने कोई गलती की है, तो मैं आपसे व्यक्तिगत रूप से क्षमा चाहता हूं। आप हमें नीचे दिए गए ईमेल पर पोस्ट हटाने हेतु संदेश भेज सकते हैं और हमारी टीम आपकी पोस्ट को दो दिनों के अंदर हटा देगी। धन्यवाद।
lekhanshala@gmail.com

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