1 –
जितने कष्ट कंटकों में है, जिनका जीवन सुमन खिला,
गौरव गंध उन्हें उतना ही, यत्र – तत्र – सर्वत्र मिला।
2 –
मंजिल मिले या न मिले, जिदंगी कभी रुकती या थमती नहीं है और व्यक्ति अपने जीवन में बेहतरी के लिए हमेशा प्रयास जारी रखता है।
3 –
खुद की कमियां ढूंढना बड़ी हिम्मत का काम है और बड़े – बड़े तीसमार ख़ां इस काम में असफल हो जाते हैं।
4 –
निंदक नियरे राखिए, आंगन कुटी छवाय।
बिन पानी साबुन बिना, निर्मल करे सुभाय।।
5 –
जिससे ख़ुद के भीतर के भी ऐब दिखाई देते हों,
हमने ऐसा ही एक अपना चश्मा बनवा रखा है।
6 –
जब तक न सफल हो, नींद चैन को त्यागो तुम,
संघर्ष का मैदान छोड़कर, मत भागो तुम,
कुछ किये बिना ही जय – जयकार नहीं होती,
कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।
7 –
हम जितना पढ़ते हैं, पाते हैं की उससे कहीं ज़्यादा हमने पढ़ा ही नहीं है। दरअसल ज्ञान का सागर अथाह है और हमने इसकी कुछ बूंदें ही चखी हैं।
8 –
कुछ लिख के सो,
कुछ पढ़ के सो,
तू जिस जगह जागा सवेरे,
उस जगह से बढ़ के सो।
9 –
कठिन परिश्रम का पुरस्कार है और अधिक परिश्रम।
10 –
लाख मुश्किल ज़माने में है,
रिश्ता तो बस निभाने में है।
___
स्रोत…
पुस्तक ~ रुक जाना नहीं…
लेखक ~ निशांत जैन
प्रकाशन – प्रभात
पृष्ठ संख्या – 14, 16, 17, 18, 19, 21, 22
नोट –
लेखनशाला संस्था की ‘शब्दांजलि’ का उद्देश्य आपकी पुस्तक की सहायता से उदास चेहरों पर खुशियों की एक छोटी सी झलक दिखाना है। उन्हें कुछ बताना है, कुछ सिखाना है। यदि आपको लगता है कि आपकी पुस्तक का उपयोग करने में हमने कोई गलती की है, तो मैं आपसे व्यक्तिगत रूप से क्षमा चाहता हूं। आप हमें नीचे दिए गए ईमेल पर पोस्ट हटाने हेतु संदेश भेज सकते हैं और हमारी टीम आपकी पोस्ट को दो दिनों के अंदर हटा देगी। धन्यवाद।
lekhanshala@gmail.com