…….. मैं ही वर्तमान हूँ…….
अतीत, चाहे जैसा भी रहा हो
आज का होना ही मेरे लिए
साक्षी है मेरे अस्तित्व का
क्यों घूमता फिरूँ मैं
अतीत की अंधेरी गलियों में
क्यों न बढूं प्रकाश की ओर जहाँ देख सकूँ, स्वयं को भी और जगत को भी
अपनों के बीच ही रहा अबतक
अब सपनों के साथ अपने
सबके बीच रहने की तमन्ना है
लेखनी के संग चल रहा हूँ मैं
नहीं देखा कल किसी ने
वर्तमान ही बुनता है भविष्य के धागे
मैं ही तो वर्तमान हूँ
स्वयं का भी और समाज का भी
चल पड़ा हूँ मानवता की राह पर
मानवता को संग लिए
मानवता की खातिर
इन्हीं संवेदनाओं के साथ
रहे या टूटे सांस जीवन की
………………………
डॉ. मोहन तिवारी, मुंबई