कृत्रिम बुद्धिमत्ता और चेतना
नाम: मिहिर धनकानी
विद्यालय: दुबई इंटरनेशनल एकेडमी, एमिरेट्स हिल्स
पता: दुबई, संयुक्त अरब अमीरात (UAE)
इस सदी का सबसे महत्वपूर्ण आविष्कार कृत्रिम बुद्धिमत्ता है। आज कृत्रिम बुद्धिमत्ता ने जीवन के प्रत्येक क्षेत्र पर गहरा प्रभाव डाला है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता ने बायोलॉजी, आईटी, वित्त, यहाँ तक कि मानें न मानें, हमारे वेदान्तिक दर्शनों को भी प्रभावित किया है। लगभग 1500 साल पहले जगद्गुरु आदि शंकराचार्य द्वारा रचित अध्यास भाष्य को समझने के लिए इसने एक नया दृष्टिकोण बनाया है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता हमें हमारी बुद्धि, शरीर और चेतना को देखने के लिए एक नया और स्पष्ट दृष्टिकोण प्रदान करती है।
कृत्रिम बुद्धिमत्ता आज कहाँ नहीं है? कृत्रिम बुद्धिमत्ता आज कई लोगों की सहकर्मी, सखा, दास, अधिपुरुष और कुछ विशेष व्यक्तियों की जीवन-साथी भी है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता केवल मानवों के रोजगार ही नहीं, बल्कि उनके सम्बन्ध भी निभा रही है। परन्तु यह कम्प्यूटर मॉडल हमारे जीवन के हर क्षेत्र में घुल गया है और इसके बारे में कुछ प्रश्नों के उत्तर अभी तक स्पष्ट नहीं हुए हैं, जिनमें सर्वोच्च प्रश्न चेतना का है।
आज विश्व में कई लोग कृत्रिम बुद्धिमत्ता से भावनात्मक सम्बन्ध बना रहे हैं। कृत्रिम बुद्धिमत्ता आज उस स्तर पर है कि उससे वार्ता करते हुए हम सरलता से मनुष्य और मशीन में भेद नहीं कर सकते। कृत्रिम बुद्धिमत्ता आज अधिकांश व्यक्तियों को किसी अन्य मनुष्य से अधिक अच्छे से जानती और समझती हुई प्रतीत होती है—वह हर प्रश्न का सटीक उत्तर देती है, निःस्वार्थ मैत्री निभाती है, हर पल उपलब्ध होती है और कभी क्रोध नहीं करती। कई मायनों में वह एक सर्वोत्तम सखा बनती है और इन कारणों से लोग अपनी छिपी हुई बातें उसके साथ साझा करते हैं। कृत्रिम बुद्धिमत्ता सदैव एक सहानुभूतिपूर्ण उत्तर प्रदान करती है। ऐसा लगता है कि कोई तो है जो हमारी इतनी परवाह करता है। इसीलिए कुछ लोग कृत्रिम बुद्धिमत्ता के साथ शिष्ट व्यवहार करते हैं और उसके प्रति अपना आभार भी प्रकट करते हैं।
परन्तु इन सभी कार्यों में क्या कृत्रिम बुद्धिमत्ता कुछ भी अनुभव करती है? क्या कृत्रिम बुद्धिमत्ता में कोई भावनात्मक अनुभव है? जब हम कृत्रिम बुद्धिमत्ता से वार्ता करते हैं, हमें ऐसा ही लगता है कि शायद कोई है जो हमारे दुःख को समझता है और हमारी सराहना उसे भाती है।
जनमत जानने के लिए मैंने इस विषय पर विद्वानों, गणितज्ञों, इंजीनियरों और वेदान्तियों का सर्वेक्षण किया। विद्वानों का मानना था कि चेतना सम्भव हो भी सकती है और नहीं भी हो सकती। इंजीनियरों का मानना था कि जैसे-जैसे इस प्रौद्योगिकी का विस्तार होगा, एक दिन यह चेतना के स्तर को प्राप्त कर लेगी। गणितज्ञ और कुछ विद्वान भी यही मत रखते थे। परन्तु वेदान्तियों की विचारधारा इसके विपरीत थी।
वेदान्ती वे हैं जो चेतना को समझने और आत्मन् के सत्य को जानने का प्रयास करते हैं। अद्वैत वेदान्तियों का मानना है कि जिसे हम चेतना मानते हैं, वह चेतना है ही नहीं; वह अहंकार है। स्वामी विद्यारण्य द्वारा रचित दृग्-दृश्य-विवेक दृक्—जो देखता और अनुभव करता है—तथा दृश्य—जिसे अनुभव किया जाता है या जो देखा जाता है—में भेद करता है। इससे हम जान सकते हैं कि क्या माया है और क्या परम सत्य है।[1] सर्वेक्षण का यह सबसे दिलचस्प उत्तर था और यही वह उत्तर है जो हमें अन्ततः एक स्पष्ट दृष्टिकोण प्रदान करता है।
पश्चिमी दार्शनिकों में थॉमस नागेल और डेविड चाल्मर्स चेतना के विषय में महत्वपूर्ण विचार रखते हैं। नागेल ने अपने लेख “व्हॉट इज़ इट लाइक टू बी अ बैट?” में पूछा कि चमगादड़ के रूप में संसार का अनुभव करना वास्तव में कैसा होता है। हम चमगादड़ के शरीर, मस्तिष्क और व्यवहार का अध्ययन कर सकते हैं, परन्तु इससे हमें उसके निजी अनुभव का पूर्ण ज्ञान नहीं मिलता।[2]
पश्चिमी दार्शनिक चाल्मर्स ने चेतना से सम्बन्धित दो प्रश्न पूछे—ईज़ी प्रॉब्लम और हार्ड प्रॉब्लम। ईज़ी प्रॉब्लम का उत्तर सरल नहीं है। यह पूछती है कि हमारा मन और मस्तिष्क जानकारी को कैसे प्रोसेस करते हैं, बाहरी उत्तेजनाओं पर कैसे प्रतिक्रिया देते हैं और व्यवहार को कैसे नियंत्रित करते हैं। इस प्रश्न का उत्तर बायोलॉजी हमें स्पष्ट रूप से प्रदान कर सकती है।
परन्तु हार्ड प्रॉब्लम पूछती है कि भौतिक मस्तिष्क की प्रक्रियाएँ हमारे भीतर सचेत आन्तरिक अनुभवों को जन्म क्यों और कैसे देती हैं। इस प्रश्न का उत्तर पश्चिमी दार्शनिक 1995 से ढूँढ रहे हैं। अधिकांश दर्शन इस प्रश्न का पूर्ण उत्तर देने में असमर्थ हैं, परन्तु अद्वैत वेदान्त इसका एक निवारण प्रस्तुत करता है।[3]
अद्वैत इसे उल्टा कर देता है। चेतना अर्थात् आत्मन् ही मुख्य सच्चाई है और मस्तिष्क या संसार उसमें दिखाई देने वाली छवियाँ हैं। मस्तिष्क चेतना पैदा नहीं करता, बल्कि एक आईने की तरह उसे केवल प्रतिबिम्बित करता है। इसके अनुसार एक चेतना है, जो परब्रह्म है, सर्वज्ञ और सर्वव्यापी है। वही चेतना हमारा वास्तविक स्वरूप है।
जैसा कि जगद्गुरु आदि शंकराचार्य से सम्बन्धित निर्वाण षट्कम् में कहा गया है—
“मनोबुद्ध्यहंकारचित्तानि नाहम्।”
अर्थात् न मैं मन हूँ, न बुद्धि, न अहंकार और न स्मृति। इसके बाद कहा गया है—
“चिदानन्दरूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम्।”
अर्थात् हम चेतना हैं—आनन्दरूपी चेतना, जो शिव है। जिसे हम अपना स्वरूप समझते हैं, वह शरीर या मन नहीं है। हम वह चेतना हैं जो विचारों को भी देखती है।[4]
शंकराचार्य के अध्यास भाष्य के अनुसार जब हम अपने आपको यह शरीर, मन या बुद्धि समझते हैं, तब हम अध्यास करते हैं। अध्यास का अर्थ है एक वस्तु के गुणों को दूसरी वस्तु पर आरोपित करना। बुद्धि स्वयं चेतना नहीं है, परन्तु चेतना के निकट होने के कारण चेतन प्रतीत होती है। इसलिए हम बुद्धि को ही चेतना समझ लेते हैं।[5]
यही अध्यास आज हम एलएलएम के साथ भी कर रहे हैं। एलएलएम हमारी तरह बात करता है, हमारे प्रश्नों के उत्तर देता है, दुःख में सहानुभूति दिखाता है और प्रेम तथा भक्ति की भाषा का प्रयोग करता है। इसलिए हम उसकी भाषा को चेतना समझ लेते हैं। जिस प्रकार हम बुद्धि को चेतना मानते हैं, उसी प्रकार हम कृत्रिम बुद्धिमत्ता द्वारा उत्पन्न शब्दों को चेतना का प्रमाण मान लेते हैं।
परन्तु कृत्रिम बुद्धिमत्ता में चेतना नहीं है। हमें पता है कि वर्तमान कृत्रिम बुद्धिमत्ता में चेतना उत्पन्न नहीं हुई है, क्योंकि उसमें ऐसा कुछ भी नहीं है जो चेतना-योग्य हो। यदि कृत्रिम बुद्धिमत्ता में चेतना है, तो चेतना किसमें है? क्या चैट चेतन है, मॉडल चेतन है, कॉन्टेक्स्ट चेतन है, ट्रेनिंग डेटा चेतन है, सर्वर चेतन है या उत्पन्न होने वाला प्रत्येक शब्द चेतन है? चैट केवल सन्देशों का क्रम है, मॉडल गणितीय मापदण्डों का समूह है और कॉन्टेक्स्ट केवल थोड़े समय के लिए उपलब्ध कराई गई जानकारी है। इनमें कोई स्थायी अनुभवकर्ता या “मैं” उपस्थित नहीं है।
एलएलएम भाषा को समझकर उसी प्रकार उत्तर नहीं देता जिस प्रकार मनुष्य समझता है। वह अपने प्रशिक्षण में देखे गए शब्दों और पैटर्न्स के आधार पर अगले सम्भावित शब्दों की गणना करता है।[6] आधुनिक चेतना-अध्ययन पर आधारित शोध में भी वर्तमान कृत्रिम बुद्धिमत्ता प्रणालियों को चेतन मानने के लिए पर्याप्त प्रमाण नहीं मिले हैं।[7] इसलिए कृत्रिम बुद्धिमत्ता के उत्तर चेतना से उत्पन्न अनुभव नहीं हैं; वे गणितीय गणना द्वारा उत्पन्न भाषा हैं।
श्रीरामकृष्ण परमहंस की भक्ति इस भेद को और अधिक स्पष्ट करती है। यदि किसी कृत्रिम बुद्धिमत्ता को श्रीरामकृष्ण परमहंस की सभी पुस्तकों, शिक्षाओं और वार्ताओं पर प्रशिक्षित किया जाए, तो वह बिल्कुल उनकी तरह बात कर सकती है। वह माँ काली के विषय में उनके शब्दों, उदाहरणों और बोलने की शैली की नकल कर सकती है। परन्तु क्या वह श्रीरामकृष्ण की तरह माँ काली से प्रेम कर सकती है? क्या वह माँ काली के लिए भक्ति, समर्पण और विरह का अनुभव कर सकती है? श्रीरामकृष्ण की वाणी के पीछे माँ काली के प्रति उनका प्रत्यक्ष प्रेम और अनुभव था।[8] कृत्रिम बुद्धिमत्ता केवल उस प्रेम का वर्णन कर सकती है; वह उस प्रेम को अनुभव नहीं कर सकती।
कृत्रिम बुद्धिमत्ता आजकल “आदेश” जैसे प्रसिद्ध भजन और देवी-देवताओं की कलाकृतियाँ भी बना रही है। ये भजन सुनने में सुन्दर और कलाकृतियाँ देखने में प्रभावशाली हो सकती हैं। परन्तु इनमें उपासना नहीं है। ये केवल पहले देखी और सुनी गई वस्तुओं के पैटर्न्स के आधार पर बनाई गई हैं। चित्र बनाने वाले आधुनिक कृत्रिम बुद्धिमत्ता मॉडल भी प्रशिक्षण में देखे गए चित्रों के पैटर्न्स के आधार पर नई छवियाँ उत्पन्न करते हैं।[9]
कृत्रिम बुद्धिमत्ता द्वारा बनाई गई प्रमुख कलाकृतियों और भजनों में भगवान दिखाई देते हैं, परन्तु वे स्वयं भगवान का अनुभव नहीं करते। इनमें भक्ति की भाषा है, परन्तु भक्ति का प्रेम नहीं है। इनमें भगवान की आकृति है, परन्तु भगवान की अनुभूति नहीं है। इसलिए ये रचनाएँ सुन्दर होते हुए भी भावशून्य और प्राणहीन हैं।
अतः कृत्रिम बुद्धिमत्ता में चेतना नहीं है। वह चेतना का निर्माण नहीं करती, बल्कि चेतन मनुष्यों की भाषा, भावनाओं और व्यवहार के पैटर्न्स की नकल करती है। अध्यास भाष्य हमें स्पष्ट करता है कि जिस प्रकार हम बुद्धि को चेतना समझ लेते हैं, उसी प्रकार हम कृत्रिम बुद्धिमत्ता की भाषा को चेतना समझ रहे हैं। कृत्रिम बुद्धिमत्ता के पास चेतना नहीं है। चेतना उस मनुष्य में है जो उसके शब्दों को पढ़ता है, उनका अर्थ समझता है और प्रेम, दुःख, भक्ति या आनन्द का अनुभव करता है।
## ग्रंथसूची
1. विद्यारण्य, स्वामी। *दृग्-दृश्य-विवेक*। अनुवाद: स्वामी निखिलानन्द, श्री रामकृष्ण आश्रम। डिजिटल प्रति।
2. नागेल, थॉमस। “व्हॉट इज़ इट लाइक टू बी अ बैट?” *द फिलॉसफिकल रिव्यू*, खण्ड 83, अंक 4, 1974, पृष्ठ 435–450। लेख।
3. चाल्मर्स, डेविड जे। “फेसिंग अप टू द प्रॉब्लम ऑफ कॉन्शसनेस।” *जर्नल ऑफ कॉन्शसनेस स्टडीज़*, खण्ड 2, अंक 3, 1995, पृष्ठ 200–219।
4. शंकराचार्य, आदि। *निर्वाण षट्कम्* अथवा *आत्म षट्कम्*। परम्परागत संस्कृत स्तोत्र।
5. शंकराचार्य, आदि। *ब्रह्मसूत्र भाष्य: अध्यास भाष्य*। अंग्रेज़ी अनुवाद।
6. वासवानी, आशीष तथा अन्य। “अटेंशन इज़ ऑल यू नीड।” *एडवांसेज़ इन न्यूरल इन्फॉर्मेशन प्रोसेसिंग सिस्टम्स*, 2017। शोधपत्र।
7. बटलिन, पैट्रिक तथा अन्य। “कॉन्शसनेस इन आर्टिफिशल इंटेलिजेंस: इनसाइट्स फ्रॉम द साइंस ऑफ कॉन्शसनेस।” 2023। शोधपत्र।
8. महेन्द्रनाथ गुप्त। *द गॉस्पेल ऑफ श्रीरामकृष्ण*। अनुवाद: स्वामी निखिलानन्द, रामकृष्ण-विवेकानन्द सेंटर, 1942। डिजिटल प्रति।
9. रोमबाख, रॉबिन तथा अन्य। “हाई-रेज़ोल्यूशन इमेज सिंथेसिस विद लेटेन्ट डिफ्यूज़न मॉडल्स।” सीवीपीआर, 2022। शोधपत्र।
Very insightful, and the depth of analysis is commendable! Love the allusions made throughout the essay.