मेरा परिवार हिंदी कविता || साक्षी प्रजापति || लेखनशाला

मेरा परिवार

 

घर की देहरी ने मुझको समय से पहले बड़ा किया,

अपने हिस्से का हर सपना खुद को ही खड़ा किया।

होठों पर मुस्कान रही, मन ने पीड़ा में मौन किया,

बड़ी बहन कहलाने का मैंने हर उत्तरदायित्व लिया।

 

पिता के श्रम की रेखाएँ जब माथे पर उतर आती हैं,

माँ की भीगी पलकों में जब खुद आहें भर जाती हैं।

तब मैं अपने अश्रु पीकर साहस का दीप जलाती हूँ,

उनके हर अधूरे स्वप्नों को मैं अपना धर्म बनाती हूँ।

 

मेरी प्यारी दोनों बहनों! तुम जीवन की एक भोर हो,

मेरे मन के निर्मल उपवन की सबसे सुंदर छोर हो।

पथ में काँटे आएँ तो, पहले मुझको घायल होने दो,

तुम अपने स्वप्नों के नभ में निर्भय होकर आगे बढ़ो।

 

संघर्षों की धूप मिली तो छाया बनकर जीना सीखा,

आँसू पीकर भी हर पल हंसकर आगे बढ़ना सीखा।

त्याग नहीं कोई मजबूरी, है ये मेरे जीवन का श्रृंगार,

अपनेपन की ज्योति सँजोए चलता रहता है परिवार।

 

यदि जीवन की राह कभी मुझको कठिन परीक्षा देगी,

फिर भी मेरी अटल निष्ठा हर बाधा से युद्ध करेगी।

माँ-पिता का मान, बहनों के सपनों का रखूँगी मान,

यही तपस्या, यही साधना, बस यही है मेरा परिवार।

 

 – साक्षी प्रजापति

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