शब्द जिसके मौन हैं अनंत में या व्योम में,
शून्य हो या हो पशु,
या हो मनुज के प्राण में!
शब्द उसके ढूंढ़ते हों,
क्या पता तुम्हीं को तब
हसरतें हो आधी,
ख्वाब भी बचे हों आधे जब!
आस टीसती हो नई।
काश! काटती हो कई
कस- म- कश की ज़िंदगी की,
हो आवाज़ चली गई!
हिम्मतों की कश्तियों को राह देते रहो
आवाज़ देते रहो,
आवाज़ देते रहो!.
– सुंदरम दिवाकर