यातना
जीवन की यातनाओं में
इतनी यातनाएं थी
कि कभी देख न सकी
अपने आप को!
आज भी जब
लेखा – जोखा करूं पूरे दिवस का
तो पाती हूं,
घिस भी दूं खुद को तब भी
कुछ नहीं है, हांसिल
किसी भी कार्य का!
मान-सम्मान की पराकाष्ठा
हो तब भी,
एक नियम पे जीने से
उचट जाता है मन!
सोचती हूँ हर दिन
कि हो मेरा “मी टाइम” भी कुछ
लेकिन कहां थाह मिलता है
वक्त का!
इस तरीके से रेत बन फिसलता है वक्त
मैं केवल उसका उड़ना देखती हूं
कितना मुश्किल है सब जानते हुए भी,
इस कदर अंजान रहना जैसे
मुझे एहसास तक नहीं इसका!
कुछ भी करूं ये यातना
ताउम्र रहेगी मुझ संग!
– पूनम मण्डल
Archana