1-
हिंदी भाषा का पांव आज विदेशी धरती पर भी जम गया है जैसे, मॉरीशस, फिजी, त्रिनिदाद, युगांडा, नेपाल, जर्मनी, अमेरिका, सिंगापुर, साउथ अफ्रीका आदि देशों में। इसलिए मैं चाहता हूं कि मैथिली का भी सिक्का दूर – दूर तक जम सके।
2 –
मानव से कैसे देवतुल्य
है बनते कैसे तुच्छ से पूज्य
किरणों की रश्मि किरनपुंज
मानव में कैसे मानव मूल्य…!
3-
वर्तनी, शब्द आए वाक्य में
भाषा भाव के ताल में
कभी मध्य तो कभी तार
कभी आ जाते मंद्र सप्तक में
विचार में विकृति आती हैं।
लेखनी विचल हो जाती हैं।
4 –
कंचन से कांति तब निखरे
जब अनल समागम होता है।
निस्तेज चांद नभ में दमके
जब पूनम समागम होता है।
मानव का सितारा तब चमके
जब अनुभव का समागम होता है।
5 –
मां से कहो कि बच्चे दे – दे
बहन भी दे – दे भाई
भारत मां के सुहाग पर कुछ ऐसी घड़ी है आई
ये सोना और चांदी क्या है उतार दो सब जेबर…।
6 –
आजकल की तरह शादी – विवाह इतना भारी नहीं था, परन्तु माता – पिता के श्राद्ध में सामाजिक और जातीय दबाव इतना बढ़ता था कि लोगों को अपना खेत बेचना पड़ता था।
7 –
मूल समस्या का समाधान मजबूती के साथ होना चाहिए, नहीं तो मुंडन और श्राद्ध के भोज में कोई अंतर नहीं रह जाएगा।
8 –
कोई कॉलेज से पढ़कर इंजीनियर – डॉक्टर बनता है तो कोई गाँव – घर में घूम – फिर कर ही वन जाता है।
9 –
कि वो पथ क्या, वो प्रतिकूलता क्या,
जिस पथ पर बिखरे फूल न हो।
मानव की वो धैर्य परीक्षा क्या
जब धारा प्रतिकूल न हो।
10 –
सन – सन – सन – सन योद्धा करते
वीरों की आई वसंत।
युद्ध का नगाड़ा बजने को था
धरती करती धम – धम – धम – धम।
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स्रोत…
पुस्तक ~ जगदीश प्रसाद मंडल एक जीवनी
लेखक – गजेंद्र ठाकुर
हिंदी अनुवाद – रामेश्वर प्रसाद मण्डल
प्रकाशन – पल्लवी प्रकाशन
पृष्ठ संख्या – 11, 12, 13, 19, 21, 30, 35, 49, 53, 68
नोट –
लेखनशाला संस्था की ‘शब्दांजलि’ का उद्देश्य आपकी पुस्तक की सहायता से उदास चेहरों पर खुशियों की एक छोटी सी झलक दिखाना है। उन्हें कुछ बताना है, कुछ सिखाना है। यदि आपको लगता है कि आपकी पुस्तक का उपयोग करने में हमने कोई गलती की है, तो मैं आपसे व्यक्तिगत रूप से क्षमा चाहता हूं। आप हमें नीचे दिए गए ईमेल पर पोस्ट हटाने हेतु संदेश भेज सकते हैं और हमारी टीम आपकी पोस्ट को दो दिनों के अंदर हटा देगी। धन्यवाद।
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