“यार जादूगर: नीलोत्पल मृणाल की लेखनी से समाज का आईना | शब्दांजलि”

1 –
लोक में लोग कह – कहकर किस्सा भी बना देते हैं और सत्ता भी।

2 –
भारत में नौकरी पकड़ी जाती थी और जॉब धरा जाता था।

3 –
जय प्रकाश को बिस्तर से उठाकर बरामदे में ले जाना, उसके हाथ – मुंह धोना और वापस बिस्तर पर ले जाकर सांझ तक उसके आस – पास रहना, इसी दिनचर्या में दिन गुजर रहे थे। धीरे – धीरे फूलचंद अब जयप्रकाश के पुनः जिंदा हो जाने के चमत्कार को लेकर सहज होने लगा था।

4 –
फूलचंद के गर्म हो चुके दिमाग को अचानक ठंड का एहसास हुआ। उसने हंसते हुए मेंटोस पकड़ा और मन – ही – मन बड़े साले का स्मरण कर कैंडी का रैपर फाड़ उसे मुंह में फांक लिया। उसकी जीभ पर शीतलता की एक झोंक उतरी और सारे मुद्दे हवा हो गए।

5 –
मां के हाथों बने खाने की सिद्धि तो उसके बच्चों के ग्रहण करने से ही होती है।

6 –
घरेलू मामलों के ऐसे मौके पर इसी तरह तटस्थ हो जाने का अभ्यासी आदमी आगे चलकर गृहस्थ हो जाता है। गृहस्थी गुटखा खाए जोशीले नौजवानों की तरह रफ़्तार में धुंआ उड़ाते बाइक चलाना नहीं है। घर तेजी नहीं धीमा होने से चलता है।

7 –
विपदा में धर्म ढेला हो जाता है, आप अपनी सुविधा के हिसाब से उसे उठाकर किनारे भी रख सकते थे। प्राचीन ग्रन्थ में इसे ही आपद – धर्म ( आपद्द ) कहा गया था।

8 – यह भी क्या अजीब बात थी ना, जब कि पूजा घर में फूल तो होने ही चाहिए।

9 –
प्रकृति का एक – एक चिथड़ा नोचकर खा जाने के बाद भी मनुष्य थका नहीं है, निराश नहीं हुआ है। उसे और जीना है, बची हुई उम्मीदें भी नोच खाने के लिए।

10 – गृहस्थ आदमी ध्यान में होता है, ध्यानस्थ नहीं होता।

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स्रोत…
पुस्तक ~ यार जादूगर
लेखक ~ नीलोत्पल मृणाल
प्रकाशन – हिंद युग्म
पृष्ठ संख्या – 7, 10, 25, 27, 40, 41, 43, 45, 46

नोट –
लेखनशाला संस्था की ‘शब्दांजलि’ का उद्देश्य आपकी पुस्तक की सहायता से उदास चेहरों पर खुशियों की एक छोटी सी झलक दिखाना है। उन्हें कुछ बताना है, कुछ सिखाना है। यदि आपको लगता है कि आपकी पुस्तक का उपयोग करने में हमने कोई गलती की है, तो मैं आपसे व्यक्तिगत रूप से क्षमा चाहता हूं। आप हमें नीचे दिए गए ईमेल पर पोस्ट हटाने हेतु संदेश भेज सकते हैं और हमारी टीम आपकी पोस्ट को दो दिनों के अंदर हटा देगी। धन्यवाद।
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