“जिंदगी को हमने ज़ूम किया: पल्लवी मंडल और अंजली ठाकुर की कविताओं से शब्दांजलि | Lekhanshala”
1-
पिता बेटी का रिश्ता
इतना असहज रहा है कि
सब जानते हुए भी
यह एक दूसरे से अंजान रहें हैं!
2 –
ख़्याल आता है लिखूं
उन सब दुखों को
जिससे दुःखी हूं या जिससे प्रभावित हूं मैं।
3-
इन आंखों से उसकी आंखों को
देखा तो, समझ आई…
आंखों को, आंखों की ज़रूरत क्यों हैं ?
4 –
आंख खूबसूरती का मुख्यकेंद्र है
जहां आकर समस्त सुंदरता का विकेंद्रीकरण
सिमट जाता है।
5 –
दरअसल
जीवन बहुत शुरू से शुरुआत है
और बहुत अंत का अंत!
मध्य में तो केवल भ्रम है।
केवल भ्रम !!
6 –
वो बेटियां, जो धरोहर हैं इस धरती की
अब चीखों में गुम हो गई हैं,
वो सपने, जो आंखों में तैरते थे
अब आंसुओं के समंदर में बह गए हैं।
7 –
हर दिन एक और कहानी
एक और चीख़
और फ़िर वही सवाल, वही सन्नाटा।
ये समाज अब क्या कहेगा
जब उसकी ही रगों में ही है ज़हर दौड़ता ?
8 –
जीवन का आवाज महज़ मृत्यु है
कुछ कदम चल लेने के बाद
हर बात का एक ही अर्थ हो जाता है
सभी मर जानते हैं! बच के कोई नहीं रहता!!
9 –
उम्मीद, आस, इच्छा, चाह
कुछ भी नहीं! जीवन तक नहीं!
10 –
तुम जो कागज के टुकड़ों में बसा
कभी चुपके से हाथों में सिमटा
कभी सपना बन, आंखों में छलका
तुम्हारा मोल क्या, कभी संपूर्ण, तो कभी अधूरा?
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स्रोत…
पुस्तक ~ जिंदगी को हमने ज़ूम किया
लेखिका – पल्लवी मंडल, अंजली ठाकुर
प्रकाशन – पल्लवी प्रकाशन
पृष्ठ संख्या – 20, 23, 25, 26, 27, 28, 29, 47, 75
नोट –
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