“ढाई आखर प्रेम का: पल्लवी मंडल की कविता से संवेदनाओं की शब्दांजलि | Lekhanshala”
1-
जिंदगी में कुछ मिला
कुछ खो गया
जो नहीं मिला शायद वह भी
और जो खो गया
वो वापस कभी मिली ही नहीं.!
2 –
कागज़ के पन्ने पर इत्र चढ़ाना और
ठगी से मुस्कुराना धोखा है
स्थायी नहीं है जो कुछ भी है
वो पतझड़ का एक झरोखा है।
3-
समाज के सांचे में लोग भगवान बनते हैं
और इसी समाज से हैवान भी निकलते हैं…
समाज में कोई इंसान बनता है
तो इंसान रूपी पशु नहीं है यहां
ये भी कोई कैसे कह सकता है ?
4 –
जीवन की इस खुली – सी किताब में
आखिरी पन्ना सबसे स्पष्ट है
फिर चिंता हमें
हमसे बढ़कर क्यूं है?
5-
अच्छा तुम बताओ सखी…!
ये ऊपरी चमक – धमक से
आकर्षित कब तक हुआ जाए
फटे हुए जज़्बात को कब तक सिला जाए ?
6 –
बच्चों के मुस्कुराहट से यूँही
जन्म लेती हैं मेरी कविताएँ
जैसे धरती को देखते घास…!
7 –
सम्बन्ध ऐसा मेरा तुम्हारा
जैसे स्नेह का प्रेम से
वाक़िफ हूं तुमसे जैसे
कोई राह अपनी मंज़िल से।
8 –
नि:स्वार्थ हुं तुमको लेकर
जैसे प्रकृति मनुष्य के लिए
मिलना तुमसे है यूँ
जैसे कोई पेड़ मिट्टी से।
9 –
फ़ेमिन्ज़म, फ्यूडलिज्म, ह्यूमैनिज्म
की बात वो करना नहीं चाहती
बस कर ले वो अपने हिस्से की पढ़ाई
इसके लिए चुप रहना है सीख जाती.!
10 –
मसला कुछ खास नहीं
पर एक बात न्यारी है
जमावड़ा है यहां बहुत
इंसान है मगर अकेला
तस्दीक ये बड़ी पुरानी है।
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स्रोत…
पुस्तक ~ ढाई आखर प्रेम का
लेखिका – पल्लवी मंडल
प्रकाशन – पल्लवी प्रकाशन
पृष्ठ संख्या – 25, 28, 33, 35, 43, 45, 49, 50, 94
नोट –
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