“नदी के द्वीप से विचारों की यात्रा – अज्ञेय के गूढ़ चिंतन का संग्रह | शब्दांजलि”

1.
जो निश्चय किया सो किया, अब बदलना ढुलमुलपन है और ढुलमुलपन बुरी चीज़ है, आदमी की संकल्प-शक्ति दृढ़ होनी चाहिए, ऐसी दृढ़ कि बस फौलाद!

2.
जब आप मानव से हट कर मानवता की बात सोचने लगते हैं, तभी आप जीवन से दूर चले जाते हैं, क्योंकि जीवन मानव का है, मानव यथार्थ है, मानवता केवल एक उद्भावना-एक युक्ति सत्य!

3.
असल में सब सिद्धान्त क्षतिपूरक होते हैं : आप जो हैं, जैसे हैं, उससे ठीक उल्टा सिद्धान्त गढ़ कर उसका प्रचार करते फिरते हैं। इससे एक तो आप अपने लिए एक सन्तुलन स्थापित कर लेते हैं, दूसरे औरों को गलत लीक पर डाल देते हैं ताकि आपको ठीक-ठीक कोई पकड़ न पा सके।

4.
कोई किसी के जीवन का निर्देशन करे, यह मैं सदा से गलत मानता आया हूँ, तुम जानती हो। दिशा-निर्देशन भीतर का आलोक ही कर सकता है; वही स्वाधीन नैतिक जीवन है, बाकी सब गुलामी है।

5.
सन्तान को पढ़ा-लिखा कर फिर अपनी इच्छा पर चलाना चाहने का मतलब है स्वयं अपनी दी हुई शिक्षा-दीक्षा को अमान्य करना, अपने को अमान्य करना, क्योंकि बीस बरस में माँ-बाप सन्तान को स्वतंत्र विचार करना भी न सिखा सके तो उन्होंने क्या सिखाया?

6.
जीवन एक बार का वरण नहीं है, वह अनन्त वरण है; प्रत्येक क्षण हम स्वीकार और परिहार करते चलते हैं।

7.
साधना आज इतनी नगण्य हो गई है; कि हमारा साध्य जीवन का आनन्द न रह कर जीवन की सुविधाएँ रह गया है यानी जीवन की हमारी परिभाषा ही बदल गई है, वह जीवन का नहीं, जीवन की क्रियाओं का नाम हो गया है।

8.
व्यक्ति चरित्रहीन हो जाता है। तब वह सृजन नहीं करता, अलंकरण करता है। नए बीज की दुर्निवार शक्ति से जमीन फोड़ कर नए अंकुर नहीं फेंकता, पल्लवित नहीं होता; झरे फूल चुनता है, मालाएँ गूँथता है, मालाओं से मर्तियाँ सजाता है। जब मर्ति पर मालाएँ सूख जाती हैं तब हमें ध्यान होता है कि सभ्यता तो मर चली-पर वास्तव में मरना तो वहाँ आरम्भ हुआ है जहाँ हम ने झरे फूल का सौन्दर्य देखना शुरू किया-डाल से टूटे फूल का!

9.
जीवन में कोई चीज़ दोबारा नहीं होती है। कम-से-कम कोई सुन्दर चीज़ नहीं। जो होती है वह सुन्दर नहीं होती।

10.
कोई भी कला-और भी कठोर स्वामिनी है; और विज्ञान का मनचलापन तो संदिग्ध भी हो सकता है, कला के बारे में तो सन्देह की गुंजाइश नहीं।

 

 

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स्रोत…
पुस्तक ~ नदी के द्वीप
लेखक ~ अज्ञेय
प्रकाशन – राजकमल प्रकाशन
पृष्ठ संख्या – 15, 23, 25, 69, 70, 73, 76, 98-99, 128, 186

नोट –
लेखनशाला संस्था की ‘शब्दांजलि’ का उद्देश्य आपकी पुस्तक की सहायता से उदास चेहरों पर खुशियों की एक छोटी सी झलक दिखाना है। उन्हें कुछ बताना है, कुछ सिखाना है। यदि आपको लगता है कि आपकी पुस्तक का उपयोग करने में हमने कोई गलती की है, तो मैं आपसे व्यक्तिगत रूप से क्षमा चाहता हूं। आप हमें नीचे दिए गए ईमेल पर पोस्ट हटाने हेतु संदेश भेज सकते हैं और हमारी टीम आपकी पोस्ट को दो दिनों के अंदर हटा देगी। धन्यवाद।
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